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जेन-जी दस कविताएँ...

jen ji das kavitayen. . .

योगेंद्र पांडेय

योगेंद्र पांडेय

जेन-जी दस कविताएँ...

योगेंद्र पांडेय

और अधिकयोगेंद्र पांडेय

    एक


    सोए रहने से
    मर जाते हैं लोग,
    भुला देती है दुनिया
    सोए हुए लोगों को।

    तुम जागो और आँखें खोलो,
    कि तुम्हारे जागने से ही
    आएगा एक नया सवेरा॥

    दो


    वो तुम्हारी आवाज़ दबाने के लिए
    रचते रहेंगे षड्यंत्र,
    तुम्हें ख़ामोश करने के लिए
    चलाएँगे गोलियाँ;
    तुम्हारी पीठ पर पड़ेगी
    उनकी लाठी की मार।

    सत्ता के नशे में चूर, अभिमानी
    नहीं जानता है
    युवा-शक्ति की ताक़त।
    युवा—तुम क्रांति के प्रतीक हो;
    तुम्हें लड़नी होगी अपनी लड़ाई,
    अपने अधिकारों की लड़ाई।

    तुम्हें अपनी आवाज़ बुलंद करनी होगी,
    लाना होगा इंक़लाब, क्योंकि—
    सोई हुई, बहरी सरकार को जगाने के लिए
    एक धमाका ज़रूरी है॥

     

    तीन

     

    हम लड़ेंगे अपने हक़ की लड़ाई,
    हम माँगेंगे अपना अधिकार।
    हम लड़ेंगे अपने सपनों के लिए।

    हम लड़ेंगे, क्योंकि लड़ने से आती है क्रांति,
    और आज ज़रूरी है क्रांति—
    एक नई क्रांति,
    समानता के अधिकार की क्रांति
    रोजी रोजगार की क्रांति॥


    चार

     

    तुम्हारे कंधे पर है
    देश की तरक़्क़ी की ज़िम्मेदारी,
    तुम्हें राह बनानी पड़ेगी
    उन्नति और विकास की।

    लड़ना पड़ेगा, छीनना पड़ेगा,
    हक़ के लिए अड़ना पड़ेगा,
    जातिवाद, रूढ़िवाद और परिवारवाद को
    तोड़ना पड़ेगा।

    तुम्हारे सामने खड़ा है तुम्हारा उज्ज्वल भविष्य,
    तुम आगे बढ़ो, नया इतिहास गढ़ो,
    एक स्वस्थ, सुंदर समाज रचने के लिए,
    अगर बग़ावत ज़रूरी है तो फिर
    छेड़ दो बग़ावत,
    उतर आओ सड़कों पर,
    लहराओ तिरंगा,
    बुलंद करो आवाज़,
    क्योंकि—
    गूंगे-बहरे लोगों को
    धमाके की आवाज़ ही सुनाई पड़ती है॥


    पाँच

     

    एक दिन उन्हें भी हार माननी पड़ेगी,
    तुम्हारे ज़िद के आगे 
    एक दिन उन्हें भी झुकना पड़ेगा, जो
    देश को कर रहे हैं खोखला,
    फैला रहे हैं भ्रष्टाचार,
    छीन रहे हैं ग़रीबों का निवाला,
    कि जिनकी वजह से बेरोज़गार युवा
    भटकते हैं सड़कों पर।

    एक दिन आएगा जब
    उनका सिंहासन डोलेगा,
    एक दिन आएगा जब हर एक युवा स्वर में ज़िंदा होंगे
    धूमिल, पाश और दुष्यंत।

    मैं इंतज़ार करूँगा उस दिन का, साथी,
    जब खिलेंगे फूल हर एक गली में,
    जब मुस्कुराएगा हर मायूस चेहरा,
    जब नहीं भटकेगा देश का युवा
    होकर बेरोज़गार।

    मैं इंतज़ार करूँगा उस दिन का, साथी,
    जब अँधेरे को चीरता हुआ 
    रौशन होगा एक नया विहान॥


    छह

    युवा हो तुम
    कि तुम्हारी आँखों में उम्मीद की चमक
    बनी रहे यथावत,
    क्योंकि उम्मीदों पर टिकी है दुनिया।

    बाहें फैलाओ इतनी,
    जिसमें समा जाए
    यह पूरा का पूरा आकाश।

    जीतने की ज़िद ऐसी,
    जैसे पहाड़ चढ़ती हुई चींटियाँ।
    पहचान गढ़ो अपनी
    भोर के तारे की तरह—
    निरंतर, शाश्वत,
    देदीप्तिमान॥


    सात

    रील की दुनिया में गुमसुम
    इन आभासी पन्नों में खोए हुए चेहरे पर
    नहीं दिखता ज़िम्मेदारी का
    कोई गुलाबी रंग।

    देश के युवा भटक रहे हैं
    किसी गुमनाम सुकून की तरफ,
    भाग रहे हैं मृग-मरीचिका के पीछे
    दहकते विस्तृत रेगिस्तान में।

    तकनीक की दुनिया में
    आँखें खोलकर चलने की ज़रूरत है,
    बहुत संभलकर बढ़ने की ज़रूरत है।
    मोबाइल की रौशनी में मुरझाए चेहरे को
    चमकने की ज़रूरत है।

    रील बनाते बच्चे
    न जाने कब हो गए जवान—
    बचपन पर पसरा गया
    ज़हरीला साँप।

    मोबाइल के दौर के बच्चे
    नहीं महसूस कर सके
    गुड्डा-गुड़िया का खेल,
    नहीं महक पाए
    माटी की सुगंध।

    बहुत दूर चले गए
    दादा-दादी की क़िस्से-कहानियों से,
    माँ की लोरी और
    पिता की डाँट-फटकार से॥


    आठ

    नई उमर की देह में
    दौड़ता हुआ गर्म लहू,
    कि इस लहू में बहना चाहिए
    क्रांति का लाल रंग।

    तुम्हारी आवाज़ में गूँजे एक स्वर—
    इंक़लाब का स्वर,
    नवजागरण का स्वर,
    देशहित जयगान का स्वर।

    आने वाला समय तुम्हारा है,
    तुम गढ़ो अपना भविष्य।
    आँखों में चमकने दो
    नित-नए स्वप्न के सितारों को।
    खिलने दो प्रगति की
    सुखमय, सुंदर बहारों को॥


    नाै

    जीतने की उम्मीद
    बनी रहे नवजवानों के मन में यथावत,
    गिरकर फिर संभलने की
    दृढ़ इच्छा हो प्रबल।

    तोड़ों ये चट्टानें और
    बनाओ अपनी राह नूतन,
    पथ के काँटों को चुन-चुनकर
    लुटाओ फूलों का सौरभ।

    हे नवभारत के कर्णधार,
    तुम जागो कि यह दुनिया
    चलेगी तुम्हारे पदचिह्नों पर —
    अमर होगी दिगंत में
    युवा शक्ति की आवाज़॥

    दस

     

    क्रांति लाने के लिए ज़रूरी है कविता
    और कविता में गूंजे युवा स्वर।
    कविता आवाज़ है दबे-कुचले, बेज़ुबानों की।
    कविता की भाषा में आग बरसनी चाहिए, क्योंकि
    विद्रोह का पर्याय होती है कविता।

    कलम से निकली हुई गोली
    कभी नहीं चूकती,
    और काग़ज़ की सहनशक्ति
    होती है सबसे अधिक।

    भ्रष्ट तंत्र से लड़ने के लिए
    तुम्हें उठानी होगी कलम,
    रचने होंगे इतिहास, रचने होंगे छंद।

    प्रतिरोध की कविता के लिए
    काफ़ी है अख़बार का सिर्फ़ एक ही कोना।

    अगर भ्रष्टाचार से लड़ना है,
    तानाशाहों को कुचलना है,
    तो कविता की अलख जगानी होगी,
    युवाओं को आवाज़ उठानी होगी।

    अधिकारों की लड़ाई लड़ने के लिए
    तुम्हें ज़िंदा रखना होगा
    अपने प्रिय कवि को—
    प्रतिरोध के अमर स्वर को॥

    स्रोत :
    • रचनाकार : योगेंद्र पांडेय
    • प्रकाशन : हिन्दवी के लिए लेखक द्वारा चयनित

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