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[इस कविता का बेनाम होना बेहतर है]

ठंडी हवाओं में
पेड़ पर
झूलता है वसंत
उल्टे मुँह गिरता है
झुलसता है दिगंत।

मैंने प्रयत्न किए हैं बहुत
होना चाहा है सफल
अतल में धँसता गया हूँ
हर बार
पार किए हैं
कितने ही पत्थर
निडर होकर
पर
अब डरता हूँ
सब खोने से
अपने ऐसा होने से।

समाज को विलोम पसंद नहीं
मरघट का डोम मैं हो नहीं पाता।

स्वभावतः टूट जाएँ यदि स्वप्न
दफ़्न हो जाएँ
अनुकूल बहने लगें धाराएँ
शिलाएँ स्वतः हट जाएँगी।

सिर्फ़
एक ने
जाना है कि
मैं कर्मों से स्खलित नहीं।
स्थगित हैं अब सारे काम—
कविताएँ पढ़ना
प्रकृति से मिलना
कई पुस्तकों से
धूल झाड़ना
और जीवन से भी।

मैं छोड़ सकता था
प्रेम करना भी
पर
यह जाता ही नहीं
आता नहीं वैराग्य।

किसी अमूर्त आधार ने
अब तक
बचा रखा है
हृदय ने पचा रखी है करुणा।

एक घुटना टूट गया है
स्थिर हूँ फिर भी
शिथिल नहीं।

बस लगता है
कि
कल्पना क्षीण हो चुकी है
बिम्ब अब बनते नहीं
और
पीड़ा की नीरवता
वहन नहीं होती।

सहन नहीं होती
वाणी की उष्णता
जल चुकी हैं आकांक्षाएँ
नग्नता फिर भी छिपाता
फिरता हूँ
बिखरता हूँ
कुछ विकल्पों में
सबके लिए।
स्रोत :
  • रचनाकार : जयंत शुक्ल
  • प्रकाशन : हिन्दवी के लिए लेखक द्वारा चयनित

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