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जंगलतंत्र

jangaltantr

उद्भ्रांत

उद्भ्रांत

जंगलतंत्र

उद्भ्रांत

और अधिकउद्भ्रांत

    सरिस्का के जंगलों में

    बाघ अब नहीं दिखते

    पलामू के बाघ सुरक्षित वन्यक्षेत्र में भी

    पिछले बीस वर्षों में

    बाघों की संख्या घटकर बासठ से

    हुई अड़तीस तक

    बीस वर्षों में चौबीस बाघ लुप्त हुए।

    वन्य अधिकारियों का कहना हैं

    आँकड़े ये झूठे हैं

    बाघ कभी भी सही सलामत हैं

    किसी महत्त्वाकांक्षी अधिकारी ने

    प्रोन्नति के लिए बीस वर्ष पूर्व

    यह आँकड़ा दिया झूठा

    किंतु इन क्षेत्रों में,

    निरंतर भ्रमण करने वाले टूरिस्टों का कहना है

    हमें बाघ एक भी नहीं दिखा अब तक!

    बाघ आख़िर कहाँ गए?

    धरती उन्हें निगल गई

    अथवा फिर आसमान?

    या जंगल ने ही

    अपनी शरण में उन्हें

    दी पनाह!

    जंगल का राजा

    किस बात से भयाकुल है

    क्यों नहीं

    दिखाई वह देता है मनुष्य को?

    यह मनुष्य जो उसका करते शिकार

    लिए बंदूक़ें

    फिरता रहता है जंगल-जंगल

    बिना इसकी चिंता किए कोई

    बाघ नहीं रहेंगे तो

    संतुलन बिगड़ेगा जंगल का।

    पृथ्वी का

    समूचा पर्यावरण

    प्रदूषित हो जाएगा

    और जो करेगा

    अंततः ध्वंस मानव का।

    जंगल का भी

    एक अनुशासन, क़ायदा;

    सारे जीव-जंतु और पशु-पक्षी

    राजा की उपस्थिति को जानकर

    रहते निर्द्वंद्व हैं।

    राजा ही नहीं रहेगा तो

    कैसे बचेगा तंत्र जंगल का?

    राजे-रजवाड़े

    नए युग में विलुप्त हुए जैसे

    क्या उसी को रख ध्यान में

    मनुष्य भी

    रच रहा है

    बाघ से विहीन

    नया जंगलतंत्र?

    क्या बाघ का सौंदर्य

    और गरिमा उसकी

    मात्र दिखेगी चिड़ियाघरों में

    अथवा किताबों में?

    स्रोत :
    • पुस्तक : अस्ति (पृष्ठ 299)
    • रचनाकार : उद्भ्रांत
    • प्रकाशन : नेशनल पब्लिशिंग हाउस
    • संस्करण : 2011

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