जैसलमेर

हेमंत शेष

जैसलमेर

हेमंत शेष

और अधिकहेमंत शेष

    महल के अलंकृत छज्जों पर

    लीन होती चिलचिलाती दुपहर

    अँधेरे की स्याही में भभकती है

    कोई मद्धिम लालटेन

    चलता हूँ थार को मापने की तजवीज़ में

    ऊँट की ऊबड़-खाबड़ पीठ पर

    इधर सूनी पड़ी हैं सालों से हवेलियाँ

    उधर पश्चिम के आकाश की तरफ़ अभी-अभी फिर किरकिरी रेत का समुद्र

    निर्जन में बजा रहा है कोई कमायचा

    एक फफोले-सा यह जीवन-राग

    हठ के अनगिनत पर्याय

    जीवन यहीं है सूखे हुए तनों और पपड़ाती हुई धरती से फूटता!

    एक रंग है लाल

    जो शाश्वत रेत से उगा है और पश्चिम के सूर्य तक चला गया है

    एक आग है यहाँ जो हरेक की छाती में जलती है

    कुछ भूली-बिसरी निशानियाँ भी हैं और पदचापें

    पिछले जन्मों के नए अवतार में तुम कौन हो खेजड़ी के पेड़!

    और किस उम्मीद में हरे हो?

    कौन-सा जीवन है जिसे तुम्हें लौटाना है सूद समेत!

    नष्ट होने के विरुद्ध काल के सिलबट्टे पर

    एक जीवित आश्चर्य है यह जीवन-यात्रा!

    विदेशी हैट चिल्लाते हुए ऊँटों पर बैठ रहे हैं

    भूतपूर्व महासागर में डूबा

    एक शब्द ही नहीं है जैसलमेर

    परदेस जाते ऊँट के पीछे कोसों तक घिसटती

    पीछे छूटी मार्मिक हिचकियों की

    एक ‘ढाणी’ भी है

    राव जैसल का ग्रामीण शहर...

    आकंठ रेत और अभावों में धँसे

    आदमी की जिजीविषा का एक और

    अकाट्य साबुत सबूत।

    स्रोत :
    • रचनाकार : हेमंत शेष
    • प्रकाशन : हिन्दवी के लिए लेखक द्वारा चयनित

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