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जब तुमने मुझे ग़रीब समझा था

jab tumne mujhe gharib samjha tha

अनुवाद : सरिता शर्मा

एलिस वॉकर

एलिस वॉकर

जब तुमने मुझे ग़रीब समझा था

एलिस वॉकर

और अधिकएलिस वॉकर

    जब तुमने मुझे ग़रीब समझा था,

    मेरी ग़रीबी शर्मसार कर रही थी।

    जब ब्लैक होना अवांछनीय था

    हमें सबसे अच्छा यही लगा

    कि मैं घर पर रहूँ।

    जब उग्र सपने देखने और कड़ी मेहनत के बल पर

    चमत्कार से

    जीवन ने हमारी हर इच्छा पूरी कर दी

    तुम्हें मैं तुम्हारे अमीर दोस्तों की तरह

    अनाड़ी

    समृद्ध;

    अशिष्ट,

    असंगत रूप से धनी लगी।

    अभी भी ब्लैक हूँ,

    अब

    मेरे पास हर चीज़

    और तरह-तरह की चीज़ें बहुत अधिक हैं।

    धिक्कार है मुझे : मैं

    सफल हो गई! कौन

    जाने कैसे काला रंग अचानक स्वीकार्य हो गया?

    प्रचलन में गया!

    क्या किया जाए?

    (फ़िलहाल के लिए)

    अब लगता है भाग्य ने

    ख़ारिज कर दिया है

    अधम विफलता को

    बहरहाल?

    अब उस चाँदनी और रात ने

    मुझे आशीर्वाद दिया है।

    अब वह सूर्य

    किसी भी तरह की

    आलोचना से अभिज्ञ,

    अडिग रूप से चमकता है

    चुंबन के जादू ने बनाया है

    मेरे चेहरे के

    अँधेरे और उज्ज्वल आश्चर्य को।

    स्रोत :
    • पुस्तक : सदानीरा पत्रिका
    • संपादक : अविनाश मिश्र
    • रचनाकार : एलिस वॉकर

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