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जब तुम्हें निकाल दिया...

jab tumhein nikal diya. . .

अनुवाद : श्यौराजसिंह जैन

षीमे वूचैतिच

षीमे वूचैतिच

जब तुम्हें निकाल दिया...

षीमे वूचैतिच

और अधिकषीमे वूचैतिच

    जब तुम्हें निकाल दिया—

    तुम कर क्या सकते थे?

    कठिन परंतु रोज़वाला सवाल।

    जब तुम्हें निकाल दिया—

    क्या तुम सलीब ढूँढ़ सकते थे,

    क्या तुम मधुशाला का ठिकाना पा सकते थे,

    क्या तुम किसी के पास जा सकते थे?

    लंबा है और भिन्न है बाज़ार से

    तुम्हारा इतिहास।

    जब तुम्हें निकाल दिया—

    (रात्रि के पर्दे पर देखते हो)

    तुम ज़बरदस्ती रह सकते थे

    अकेले एकांत में

    और निस्पृह सतत रह सकते थे।

    सतत रहना बिना उपाधि के

    और बिना किसी मानव पशु के

    और वीरतापूर्वक कोयले में परिवर्तित होना।

    तुम काला स्मारक हो, अंत पथिक,

    जो बच्चों को डराता है, चिड़ियों को देखता है,

    और समय के झोंकों से

    सुनता है जटिल राग

    बढ़े ढेर से गिरते।

    ज्यों गुफ़ाओं में अवशैल पिंडों से होकर

    काले स्मारक से गुज़र जाते हैं।

    स्रोत :
    • पुस्तक : समकालीन यूगोस्लाव कविता-1 (पृष्ठ 87)
    • संपादक : श्यौराजसिंह जैन
    • रचनाकार : षीमे वूचैतिच
    • प्रकाशन : बाहरी पब्लिकेशंस, नई दिल्ली
    • संस्करण : 1978

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