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जब आँखें खोलकर देखा

jab ankhen kholkar dekha

कंचन बुटोला

कंचन बुटोला

जब आँखें खोलकर देखा

कंचन बुटोला

और अधिककंचन बुटोला

    जब तक वो खुले आसमान में साँस लेने को हुई,

    बेड़ियों में जकड़े हाथ गले तक पहुँच गए।

    आँखों में पानी और पानी में उबलती आग

    जैसे उसके नयन भीगे हों धूल मिटाने के लिए,

    पितृसत्ता की रंजिश को साफ़,

    बिना लाग-लपेट कर देखने के लिए।

    जहाँ कोई प्रेम नहीं है,

    पर मोह में उसकी छाया पूरी।

    जहाँ कोई सम्मान नहीं, पर मुखोटे हैं सारे।

    पग-पग पर अपमान, अवहेलना

    चुप्पी में नज़रों से चिल्लाते लोग।

    रट्टू तोते के जैसे ज़िंदगी को जीते

    आवाज़ है, पंख,

    ही सपनों में परवाज़।

    बस मेरा पिंजरा ही संसार

    कौन देखे अनंत आकाश?

    अब बोलो-आँखों में चश्में लगे हैं,

    बुद्धि को धार देते बादाम;

    फिर भी ना समझ रह गए

    ये है पितृसत्तात्मक आवाम।

    जो जान गया इस भंवर को,

    ख़ुद को देख लिया इसके अंदर

    द्वार उसने खोल दिए।

    अब रण हो चाहे,

    शांति से भवसागर पार।

    स्रोत :
    • रचनाकार : कंचन बुटोला
    • प्रकाशन : हिन्दवी के लिए लेखक द्वारा चयनित

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