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ईश्वर और मनुष्य

iishvar aur manushya

वैशाली थापा

वैशाली थापा

ईश्वर और मनुष्य

वैशाली थापा

और अधिकवैशाली थापा

    आदमी की लुटाने की मी'आद थी

    समर्पण की सीमा थी

    मैं ईश्वर-सा प्रेम करना चाहती थी

    मगर मुझ में कूट-कूटकर भरा था मनुष्य

    मनुष्य जो ईर्ष्या करता था

    हिसाब रखता था

    कमज़ोर होता था

    बीमार और दुबला

    लोग उससे पूछते थे

    क्या तुम्हें प्रेम का रोग ख़त्म कर रहा है?

    क्यों आँखें गड़ रही हैं?

    क्यों बे-वक़्त बाल सफ़ेद हुए जाते हैं?

    कभी-कभी मनुष्य का ईश्वर जाग जाता

    भाग-दौड़ कर लुटाओ-लुटाओ, चिल्लाने लगता

    उस दिन मनुष्य में केवल ईश्वर साँस लेता

    जो सिर्फ़ प्रेम करना जानता था

    प्रेम में सब कुछ हार जाना चाहता था

    लुटाने पर मनुष्य का चेहरा चमक जाता था

    लोग कहते, प्रेम निखर रहा है

    मगर ईश्वर की अवधि कम थी

    ईश्वर पर मनुष्य हावी था

    सौ दिन में ईश्वर एक बार जागता था

    मनुष्य भोगा करता और ख़त्म होता

    दग़ा देता, छल करता और अपनी ह‌ड्डियाँ गलाता

    संत आते, सूफ़ी आते और कहते

    जगा अपने ईश्वर को

    कम-से-कम इतना प्रेम कर ले कि ज़िंदा रह सके

    मगर मनुष्य एक नहीं सुनता

    उसका ईश्वर धीरे-धीरे शरीर छोड़ रहा है

    कुछ दिन बाद सिर्फ़ मनुष्य बच जाएगा

    मगर उसका बचना मुश्किल होगा।

    स्रोत :
    • पुस्तक : मेरे घर में पृथ्वी (पृष्ठ 40)
    • रचनाकार : वैशाली थापा
    • प्रकाशन : हिंदीस्थान प्रकाशन
    • संस्करण : 2025

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