जे देखैत रही
जे बुझैत रही
जे गुनैत रही
लिखैत रही आइ धरि
सैह
मुदा नहि होइत रही फराक
अपन लिखल कवितासँ
विचलन नहि रहय
अपन विचारधारासँ
हम रहैत रही विद्यमान
अपन कवितामे
अपन कविताक भूमि पर ठाढ़ हम
जे देखैत रही
जे बुझैत रही
जे गुनैत रही
लिखैत रही
सैह
मोनमे उठल अनायास एकटा प्रश्न—
हम कविताक जाहि भूमि पर रही ठाढ़
वस्तुत ओ भूमि छल ककर
ककर जजात पर ठाढ़ हम
अकानैत रही विश्वकेँ
हमर दृष्टिमे शामिल छल
आर किनक दृष्टि
ओ भूमि छल
हमर माय-बाप, हमर सर-सम्बन्धी
हमर हीत-मीत, हमर समर्थक
हमर विरोधी, सभक...
हमर कविता प्रभावित छल
एहि सभ गोटेसँ
जे जाने-अनजाने सम्बद्ध छलाह
हमर कविताक भाव-भूमिसँ
आब चाहैत छी
लिखी किछु कविता
जकर भूमि होइक अगबे हमर
नहि होइक ओहि पर
दाबी वा प्रभाव ककरो आनक
तेँ हम
आबिक’ भेल छी ठाढ़
नो मेन्स लैण्ड पर!
- पुस्तक : नो मेन्स लैण्ड पर ठाढ़ कवि (पृष्ठ 119)
- रचनाकार : आनन्द मोहन झा
- प्रकाशन : नवारम्भ, मधुबनी/पटना
- संस्करण : 2024
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