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हम नहि कहि सकैत छी अहाँकेँ अंतिम प्रणाम

hum nahi kahi sakait chhi ahanken antim prnaam

रामकृष्ण परार्थी

रामकृष्ण परार्थी

हम नहि कहि सकैत छी अहाँकेँ अंतिम प्रणाम

रामकृष्ण परार्थी

और अधिकरामकृष्ण परार्थी

    हे हमर मातृभूमि मातृभाषा

    हम नहि कहि सकैत छी अहाँकेँ अंतिम प्रणाम

    हमरा नजरिमे दुनियाँक सभसँ मिठगर

    बोली छी अहाँ

    सभसँ सुन्नर स्थान

    हम नहि कहि सकैत छी अहाँकेँ अन्तिम प्रणाम

    अहाँक अछि हमरा पर बहुते उपकार

    अहींक बोलीसँ फूजल अछि हमर पहिल बकार

    अहींक अन्न-जलसँ पलायल अछि हमर देह

    अहींक स्वच्छ बसातसँ मेटायल अछि

    हमर हरेक क्लेश

    अहींक माटि-पानिमे खेल-कूदिक'

    हम भेल छी सियान

    हम नहि कहि सकैत छी अहाकेँ अंतिम प्रणाम

    हँ, भैयारीमे होइत छैक विचारक भिन्नता

    चलैत रहैत छैक हक-अधिकारक लड़ाइ

    एकर माने नहि जे हम कायरक कलंक लगाक’

    सदैवक लेल कतहु आनठाम बसि जाउ

    हमरा रहबाक अछि एहीठाम

    हमरा बजबाक अछि मैथिलीक जुबान

    लड़िक' लेबाक अछि उचित सम्मान

    हम नहि कहि सकैत छी अहाँकेँ अंतिम प्रणाम

    हँ, हमर कर्तव्य अछि जे करी अहाँक विकास

    अहाँकेँ पाखंड, आडंबर

    अंधविश्वासक गुज अन्हारसँ निकालबाक लेल

    देखबी पुनर्जागरणक प्रकाश

    हम नहि देखि सकैत छी जे

    कोनो जाति आकि क्षेत्र विशेषक लोक

    अहाँकेँ बनौने रहय अपन गुलाम

    हम नहि कहि सकैत छी

    अहाँकेँ अंतिम प्रणाम।

    स्रोत :
    • पुस्तक : विद्रोही बसात (मैथिली कविता-संग्रह) (पृष्ठ 21)
    • रचनाकार : रामकृष्ण परार्थी
    • प्रकाशन : नवारम्भ, पटना/मधुबनी
    • संस्करण : 2024

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