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हम न जाबै बिरना

hum na jabai birna

परवाना प्रतापगढ़ी

परवाना प्रतापगढ़ी

हम न जाबै बिरना

परवाना प्रतापगढ़ी

और अधिकपरवाना प्रतापगढ़ी

    तोहरा छोड़ि के भवनवा हम ना जाबै बिरना

    माई-बाप कै छोड़ि के डेहरी जावै कहाँ अकेले,

    गाँव-गली हम कैसे भूलब जहाँ पे खाये खेले,

    हिंमई निकसी मोर परनवा

    हम ना जाबै बिरना

    बेंच बिकिन सब बप्पा-माई कइ देंहे बिदाई,

    चार जलीं दुइ झूला झूलीं रोजै परै सुनाई,

    पापी दइजा के करनवा,

    हम जाबै बिरना,

    कौन-कौनी बहिनी खातिर बेचब्या खेती बारी,

    पाछिल कर्जा पटा कहाँ हम जानी सब लाचारी,

    भूखा रोवै घर ललनवा,

    हम जाबै बिरना,

    गवा फैलि जब से समाज मा दहेज कै रोगवा,

    कुछ बहिनिन कै नइहर छूटा छूट दिवाली फगुवा,

    सुन के रोवै मोर नयनवा,

    हम जाबै बिरना,

    बीति उमिर गै जैसे अब तक आगेव बिधिना कटिहैं,

    दुइ समाज के बीच कै गहरी खाईं प्रभुऐ पटिहैं,

    परवाना अउतै वही दिनवा

    हम जाबै बिरना।

    स्रोत :
    • पुस्तक : रस गागरी (पृष्ठ 14)
    • रचनाकार : परवाना प्रतापगढ़ी
    • प्रकाशन : अभिव्यक्ति संगम, साहित्यिक संस्था, लालगंज प्रतापगढ़
    • संस्करण : 2013

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