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हम भटकी हुई पीढ़ी के लोग

hum bhatki hui piDhi ke log

अनामिका अनुगूँज

अनामिका अनुगूँज

हम भटकी हुई पीढ़ी के लोग

अनामिका अनुगूँज

और अधिकअनामिका अनुगूँज

    पूरी बेशर्मी के साथ ये प्रण ले चुके हैं कि

    हम फिर से इतिहास को दोहराएँगे,

    हम फिर से देश को बंटता हुआ देखेंगे।

    हम तब भी इतने ही नाकारा थे कि

    हमारी एकता को नहीं समझ पाए

    और सत्ता के लोलुप हमें मूर्ख बना गए।

    हम आज भी उतने ही नाकारा हैं।

    बस फ़र्क इतना आया

    कि हम पहले इतने पढ़े-लिखे नहीं थे

    इसलिए नहीं समझ पाए,

    लेकिन आज पढ़ चुके हैं तब भी ज़ाहिल ही हैं।

    हम देखना ही नहीं चाहते

    हमारे द्वारा दिए गए समर्थन वाले

    नेताओं की असफ़लताओं को।

    हम उनसे सवाल ही नहीं करना चाहते,

    क्योंकि हम कभी हमारे मुद्दों में

    हमारी ज़रूरतों को नहीं ला पाए।

    और सरकारों ने उस रिक्त स्थान में

    धर्मों का ज़हर भर दिया।

    हमने सरकारों को देश

    और सरकार के विरोध को देशद्रोह समझ लिया।

    हम विरोधियों का मज़ाक बनाते हुए

    फूहड़ता के चरम पर पहुँच चुके हैं।

    हमने अलग विचारधारा के लोगों को दुश्मन मान लिया है।

    हम जिस संस्कृति को बचाने के

    हाथ-पैर धोकर पीछे पड़े हैं,

    वह संस्कृति हमसे हाथ-पैर छुड़ाकर

    अपनी जान बचाकर भाग जाना चाहती है,

    जब हम अपने से अलग विचारधाराओं के लोगों की हत्या या मृत्यु पर ख़ुशी मनाते हैं,

    तब हम मनुष्यता की लाश पर जा बैठते हैं।

    हम अब तक की सबसे असभ्य पीढ़ी

    सबसे मूर्ख पीढ़ी

    हमारे पास

    हमारी अगली पीढ़ी को देने के लिए

    कुछ नहीं है

    सिवाय फूहड़ता के,

    नफ़रत के।

    और कमाल है कि

    हमें इसमें कोई शर्म नहीं आती...

    स्रोत :
    • रचनाकार : अनामिका अनुगूँज
    • प्रकाशन : हिन्दवी के लिए लेखक द्वारा चयनित

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