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हम बादर हन

hum badar han

सत्यधर शुक्ल

सत्यधर शुक्ल

हम बादर हन

सत्यधर शुक्ल

और अधिकसत्यधर शुक्ल

    हन बादर हन, हम बादर हन।

    है बात जगाधिन की, हमका

    दुनिया की दसा निहारै बदि,

    मघवा पठइनि भुँइ के उप्पर

    धरती की बिपति बिदारै बदि।

    हम खाले उतर्यन खुसी-खुसी

    अग्गासै ते उड़ि-उड़ि देख्यन,

    ऊसर-बंजर बन-बिजन-नगर

    गाँवन क्वाना-क्वाना लेख्यन।

    हम देख्यन—हिंया बड़े छोटेन

    का काटि-काटि घरबारु भरैं,

    दुखियन के दुखी परान मूसि के

    खूनु चूसिकै मौज करैं।

    हम देख्यन-भुँइ पर ऊँच-नीच

    है चारिउ घाई अनाचार,

    बिछि रही बिषमता घर-घर मा

    कहुँ मुलुकि रहा है सदाचार।

    सिगरी तलियन के फटे प्याट,

    सिगरे जीवन के बाँठ सूख,

    ना कहूँ हरेरी क्यार नाउँ

    सब डूँड़-फूँड है ठाढ़ रूख।

    दिनु-राति मसक्कति करि-करि के

    दुखिया किसान निज बवैं ख्यात,

    जामैं जमैं तौ पानी बिनु,

    सूखा पाला करैं घात।

    पानी-पानी खरु-फूसु रटै

    पानी पानी पानी ग्वहार,

    पानी-पानी बिनु जगु तबाह

    पानी बिनु ब्याकुल नदी-नार।

    जो थ्वारा-बहुतु देइ गिरि जलु

    बड़ा समुन्दरु खैंचि लेइ,

    अपन रासिबिस्तारु करें।

    माँगे ना यक्कौ बूँद देई।

    तब हमका भुँइ पर दया लागि

    सागर पर गुस्सा आई,

    बिज्जुर-धनुहा-पाथर लैके

    दौरयन ग्यन मूँड़े घहराई।

    वहिका ड्यरवाइ हराइ भरेन

    पानी, ज्यत्ता कुछु भरि पायन,

    प्यासी भुँइ सबु ना छीनि लेइ

    यहु सोचि नभै मा मँडरायन।

    सब भुँइ का दीब बराबरि जलु

    अग्गासै ते उड़ि उड़ि बँटिबा,

    देखिब ज्यहिकी ज्यतनी पियास

    वतनै जलु दै, पीड़ा हरिबा।

    अस सोचि गगन मा बिचरि चल्यन

    उछरति-कूदति-उमड़ति-गरजति,

    भुँइ की गरमी पर ताल ठोंकि

    उतरयन इतिहासु नवा सरजति।

    कोऊ ना अपन-बिरान हुँवा

    ना नभ मा क्वै साथी-संघी,

    क्यहिते अगिली गल्ली पूँछी

    बसि बिड़रि चल्यन इंघी-उंघी।

    हा! जानि हमैं अनजान पथिक,

    सुरजौ झरसावै लगे द्याँह,

    डगरोही-पवन मिले तबहें

    हम पकरयन उनहें केरि बाँह।

    भुँइ ते अकास लौं वहिं लम्बे

    उनका सब दिसि मसहूर नाउँ,

    मुल आइ सिंधु पर डगर भूल्य

    भूले सबु अपना ठाँउँ गाउँ।

    उइ बोले 'हमहुँक लिहे चलौ

    हम साथु जिंदगी भर द्याबा,

    तुम धरती का जलदानु दिह्यौ

    कुछु थ्वारा पुन्नि हमौं ल्याबा।'

    हम कह्मन—'भाग्य की बड़ी बात

    तुमहू दानी, हमहू दानी,

    संजोगु भिरा खूबै, दूनौ की

    द्याखैं राह बिकल प्रानी।'

    हम आगे ते उनका खैंची

    पाछे ते धक्का वहिव देइँ,

    बहि गंधरपन के परबाबा

    'सन् सन्' बाँसुरी बजाइ लेइँ।

    तब बिजुरी बहिनी थिरक उठै

    हम तबला की धुनि टहँकारी

    हमरे सिगरा परिवार संघ

    उनकिउ सैना अति ही भारी।

    आगे पहाड़ ते टकरायन

    अक्काचित्ती जलु ढ्यार गिरा,

    मुल झट्ट संभरि दुष्टन बदि कै

    लइ लिह्यन संघ थोरे पथरा।

    फिरि बढ़ेन जगत का जलु बाँटति

    सब दुनिया देखि-देखि फूलइ।

    क्वै आल्हा रामाइन गावै

    क्वै पैंगइ भरि भरि के झूलइ।

    क्वै नाचि उठा दै थिरकैया

    क्वै राग-मल्हार सिहाइ उठै,

    क्वै ‘कारे मेधा पानी द्यउ'

    कहि आँगन मा अठिलाइ उठै।

    म्वरवा नाचे पखना पसारि

    झिल्ली सत्तैसा झनकारैं,

    भुँइ ते ताजे-ताजे निकसे

    पियरे म्यढुका रौ गुंजारैं।

    धनुहा द्यखाइ के गरजि-तरजि

    सुरजन का अपने बस कीन्हेंन,

    जो समुहें आइ बने रोड़ा

    पाथर की मारु उन्हैं दीन्हेंन।

    फिरि हम नभ ते पानी बरस्यन,

    झर-झर-झर-झर, धर-धर-धर-धर,

    तब धरती ते आवाज उठी

    हर हर संकर, संकर हर हर।

    गरमी के निकसे प्रान, भजी

    रबि ते माँगै के हेतु सरन,

    पथु गाँसि कहेन, ना हिंया सुर्ज

    हम बादर हन, हम बादर हन।

    सूखी खेती हरियाइ उठी

    तरु द्याँह धोइ लहराइ उठे,

    हरषाइ उठे सब जीव-जन्तु

    पंछी सुख ते ब्यल्हराइ उठे।

    तलियन के जुरे कर्याज सबै

    धारै बहि-बहि हहराइ चलीं,

    छाती किसान की गरगजु भइ

    नद्दी सब बाँध त्वराइ चलीं।

    क्वै तारीफन के पुल बाँधिसि

    कोई हम ते उपदेसु लिहिसि

    क्वै बिरहिनि हमका दूत मानि

    निज प्रेमी का संदेसु दिहिसि।

    क्वैली कूकी 'को है, को है?'

    क्वै ब्वाला आये पाहुन

    तब हम खुदहे बोलि उठयन

    हम बादर हन, हम बादर हन।

    1957 ई.

    स्रोत :
    • पुस्तक : अरघान (पृष्ठ 55)
    • रचनाकार : सत्यधर शुक्ल
    • प्रकाशन : पं. वंशीधर शुक्ल स्मारक एवं साहित्य प्रकाशन समिति, मन्यौरा, लखीमपुर खीरी
    • संस्करण : 2021

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