Font by Mehr Nastaliq Web

हृदयोद्गार

hridyodgar

भुवनेश्वर सिंह ‘भुवन’

और अधिकभुवनेश्वर सिंह ‘भुवन’

     

    (1)

    भावना चिर सुप्त चौँकल, सुमुखि, नव-उल्लास जागल,

    अभिनवे उद्गार सँ मन भेल जाइछ आइ पागल,

    के कहै अछि रंक छी हम, के कहए हमरा अभागल?

    मा शिवा-पदपद्म संवल, मन मधुप जहि मध्य लागल।

    गाउ, नाचू, मा अबै छथि, दिव्य स्वागत-साज साजू।

    चन्द्रिका1, घूरन2, करू जय-नाद, जय जगदम्ब बाजू॥

    (2)

    भावना की वन्धु, प्रस्तुत अछि जखन हृदयक सिंहासन,

    चाहती करुणामयी की भक्त सँ किछु आन आसन?

    जे हमर नहि साध्य सम्प्रति थीक से हुनके सुशासन,

    जँ जुड़त नैवेद्य नहि, रखबैन्हि सम्मुख छूछ बासन।

    धूप अन्तर ज्वाल जरइछ, बरए हृदय-प्रदीप-बाती।

    तुच्छ निधिपति, धन्य हम होएब, जुड़ाएत आइ छाती॥

    (3)

    मा, कुपूतक भावना जनि लाउ करुणा कए पधारू,

    हम अकिंचन छी; मुदा वसुधाक सम्भृति केँ निहारू।

    शारदीये, अैल अवसर अपन वचनकेँ मोन पारू,

    आगमन केर शंख फूँकै छी, निराश्रय केँ सम्हारू॥

    आँखि युग अछि बनल गंगा आओर यमुना केर धारा—

    अर्ध्य-वत् प्रस्तुत पखारू पएर मा, ओहीक द्वारा॥

    (4)

    बुद्धि-विद्याहीन हम, नहि तन्त्र-मन्त्रक भेद जानी,

    चित्त चंचल, कोन तरहेँ अम्ब, योग-समाधि ठानी।

    जन्मसँ अनुखन रटै छी नाम केवल भव-भवानी,

    जँ न राखब लाज तँ निज लाज जाएत विन्ध्यरानी॥

    हृत्कमल अर्पित जखन, की अर्चना वन-फूल द्वारा?

    पाबि शिववत् भेल छी, भुवनेशि-पद-मकरन्द-धारा॥

    (5)

    आइ दुःखक लेश नहि, मन समुद मा, गुण-गान गाबए,

    स्नेहमयि, झाँकी अहाँ केर घर भरिक लोचन जुड़ाबए।

    करब करुणामयि, कृपा, दिन एहन रिपुहुक हेतु आबए,

    जाए मति 'भुवन'क विमल भए, तुअ चरण तन-मन लगाबए।

    कामना वरदे, सतत पदपद्ममे निज रति बढ़ाबी।

    ठेलि दी पाताल मे वा गौरवक गिरि पर चढ़ाबी॥                     

    स्रोत :
    • पुस्तक : भुवनेश्वर सिंह ‘भुवन’ रचना-संचयन (पृष्ठ 48)
    • संपादक : अजीत मिश्र
    • रचनाकार : भुवनेश्वर सिंह ‘भुवन’
    • प्रकाशन : साहित्य अकादेमी, नई दिल्ली
    • संस्करण : 2024

    Additional information available

    Click on the INTERESTING button to view additional information associated with this sher.

    OKAY

    About this sher

    Close

    rare Unpublished content

    This ghazal contains ashaar not published in the public domain. These are marked by a red line on the left.

    OKAY