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हर पल मैं देखूँ, मित्रो, बस एक यही सपन

har pal main dekhun, mitro, bas ek yahi sapan

ओसिप मंदेलश्ताम

अन्य

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ओसिप मंदेलश्ताम

हर पल मैं देखूँ, मित्रो, बस एक यही सपन

ओसिप मंदेलश्ताम

और अधिकओसिप मंदेलश्ताम

    हर पल मैं देखूँ, मित्रो, बस एक यही सपन

    किसी अदृश्य जादू में जैसे डूबा है यह वन

    औ' गूँजे यहाँ कुछ अशांत-सी हल्की सरसराहट

    ज्यूँ रेशमी परदों की सुन पड़ती धीमी फरफराहट

    मुझे बेचैन करती हैं नित, जन की उन्मत्त मुलाक़ातें

    आँखों में भर आश्चर्य होती हैं कुछ धुँधली-सी बातें

    ज्यूँ राख तले चिंगारी जले कोई, औ' तुरंत बुझ जाए

    दिखाई नहीं देती ऊपर से जो, वे अस्पष्ट खरखराहटें

    चेहरे सपाट लगते हैं सब, धुंध में जैसे घिरे हुए

    शब्द ठहर गए होंठों पर, लगते कुछ-कुछ डरे हुए

    वनपक्षी भयभीत हैं बेहद-व्याकुल, तड़पें, छटपटाएँ

    स्वर सुन गोलीचालन का इस संध्या वे अधमरे हुए

    स्रोत :
    • पुस्तक : सूखी नदी पर ख़ाली नाव (पृष्ठ 312)
    • संपादक : वंशी माहेश्वरी
    • रचनाकार : ओसिप मंदेलश्ताम
    • प्रकाशन : संभावना प्रकाशन
    • संस्करण : 2020

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