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हमें जीने की लत नहीं थी

hamein jine ki lat nahin thi

सत्यव्रत रजक

सत्यव्रत रजक

हमें जीने की लत नहीं थी

सत्यव्रत रजक

और अधिकसत्यव्रत रजक

    एक दिन इस ज़हालत भरी दुनिया से

    हम भागना चाहे और नहीं भाग पाए

    सारी ऋतुओं में मौसम की भसड़ मची थी

    और हमारे भागने से दुनिया बहुत आगे थी

    मुसीबतें यहाँ पूछकर भी आईं

    और हमने उन्हें आने दिया

    हमारे निर्णय मृत्यु के इतने नये तरीकों तक जाते थे

    कि उम्मीद के अनाज में जब तक कली पक पाती

    तब तक मरने में कलावादी हो चुके थे हम

    एक परियोजना से उठते और दूसरे में डूब जाते थे

    घड़ी कहती रही यह अंधेरे का समय है

    लेकिन आत्मा जानती थी कि हम किस धूप से पसीजे थे

    हमें खूब रोना आया

    पर इस दुर्भाग्य में क्या था

    कि माँ की जगह हम आधार कार्ड खोजने लगे

    बादाम और बाज़ार की दुनिया हर क्षण नोचा करती थी

    चार लोग भी भीड़ थे

    उससे बढ़कर वे चुनौती थे

    ठस पहाड़ थे

    पहाड़ पर चढ़ते-चढ़ते जब थकने लगे हम

    जहाँ समतल मिला वहीं सो गए

    जाते भी कहाँ

    मरने कहाँ जाते

    नदी हममें ही थी

    हम आत्महत्या करके

    नदी में नहीं डूब सकते थे

    हमें जीने की लत नहीं थी

    हम तो नींद की आदत खोज रहे थे

    लेकिन वह क्या था

    जो घोर रात में कहता था

    तुम्हारे पास ज़िंदगी ही ज़िंदगी है

    और अगले ही दिन थका देता था

    स्रोत :
    • रचनाकार : सत्यव्रत रजक
    • प्रकाशन : हिन्दवी के लिए लेखक द्वारा चयनित

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