मोन पड़ैए आइयो
कमलदह सागरमे लागल बरबानल
अगराही लागल केसर-कियारी
आ चाननक बोनमे लागल दावानल
सोन चिड़ैक बान्हल पाँखि
आ कस्तूरी हरिनक रक्षातुर निरीह आँखि
मोन पड़ैए आइयो।
मोन पड़ैए एक-एक राति सन दिन
आ पहाड़ भेल राति
मोन पड़ैए कानमे बरकैत काच सन
ढारल जाइत अपबात
मोन पड़ैए भयाओन अजेगरक जेर
सोखल जाइत हिस्साक सभ दूध
आ अमृत गंगाजल होइत विषाक्त
छूटल जाइत धरती आ आसमान
लूटल जाइत सरोवर आ खदान
मोन पड़ैए आइयो
जाबल मूँह आ छीनल बोल
पहिरा देल गेल बसहाक खोल
मोन पड़ैए अपसियांत भेल
ठाढ़ करैत पनहीक पंडालक दिन
बांसक पोर सन चटकैत कान्ह पर
साहेबक मोफिल लेल उघैत कुरसी
अहारक बिन
आइयो मेटायल कहाँ पीठ पर
घोड़शाही दिनक चाबुकक दाग
लोहाक स्वाद
आ निलहा साहेबक पनहीक छाप
मुदा किन्नहु ने चलि सकैए बेसी दिन
नीति पर अनीति के आ
सत पर असत्त के जोर
दहाड़ि उठल हिमगिरिसँ केसरी
आ उठ' लागल गंग-जमुनाक
फेनिल जलसँ
करू वा मरूक निर्णयक शोर
जागि गेल बच्चा, बूढ़-पुरान
कोन-कोनसँ श्रमजीवी, किसान आ जुआन
जागि गेल अबला सबला बनि नारी
अन्हारेमे पसरि गेल मुक्ति किरणक धाही
‘असतो मा सद्गमय' भेल छल साकार
रूकि गेल छल महाप्रलयक ज्वारि
घूमि आयल फेर
अपन धरती आ आसमान
सूरुज आ चान
नहि रहल महासमसान बनल
अपने खेत आ खरिहान
पहदेश बनल
अपने शहर आ गाम
किए ककरो बिततै
सुरुजक आतपमे तलफैत दिन
आ निलहा मरोतक नीचाँ
तरेगन गनैत राति
करमक नाम पर कर्मकेँ हेंठ क'
शनिक अढ़ैया आ साढ़े साती
सभक लेल भोजन
आ सभकें भेटत गेह
दू कौर, दू हाथ आ दू टूक बस्तर
झाँपक लेल देह नहि रहतै
बास धरि अनेक नाम
किए रहत बनल क्यो
आबो ककरो गुलाम
किए रहतै ककरो खाँहिससँ बेसी से खेत
अनेर पड़ल धरती
आ रेत
बिना भोजन आ हेतु?
आइ धरती भेटतै ओतबे
जोतल जेतै ततबे
नहि रहत कोनो मजूर
बनल देह अछैत विदेह
श्रमक मोल घटा
किए सोंपत आजनम ककरो देह'
चेचकक दाग जेकाँ
नै अमिट बनल रहतै
महाजनी बहीक आखर
नै पियाओत जोंककेँ
क्यो देहक सोनित
आ सुख-चैन राखत ताख पर
युग-युगकेँ शोषणक
बदलत सियाह इतिहास
मुक्त काया, मुक्त चिंता, मुक्त चास-बास
हास आ उल्लास
पुँजी नियोजनक प्रक्रिया
बनत आर अधिक उदार
उद्योगक प्रबन्धमे
मजूरक हैत सहकार
सभ खेत पाओत पानि
सभक लेल सुलभ हैत रोजगार
सुख-साधन पर समाने अधिकार
जैह पढ़त
सैह गढ़त
हाथक अछैत नै लुल्ह रहत
सभक लेल सोराज
नै रोक ककरो भाषा पर
नै तुषारपात
ककरो प्रशस्त भविष्यक आशा पर
खाहें कोनो नाम आकि गाम
बस जाति सभक भारतीय
वसुधाक सभ भाय-बंधु
केर उद्गाता ई धरा-धाम
निश्चय उतारत
समग्र मनुजताक आरती
रचल जा रहल मनुजताक
मूलभूत परिभाषा
पलटि जैत निश्चय शकुनी के
कुटिल धूर्त के पाशा
व्यूह भेदनक अंतिम दीक्षा-बेलामे
नै लागत कोनो सुभद्राक आंखि
नै बान्हल जा सकत किन्नहुँ
सोन चिड़ैक पांखि
नै जमि सकत फेर
दुश्मनक पैर एहि पावन देहरि पर
नै क' सकत क्यो कुचेष्टा
फेक क' पाशा जागल केहरि पर
बंधु! अहाँ जाउ
अहाँकेँ मनुक्खक मसानी साधना
आ चट्टानी मनोबलक गवाही
मसानजोड़ आ भाखड़ा-नंगलक
बान्ह बजाबैए
अहाँकेँ भिलाइ, बोकरो आ दुर्गापुर
लौह-नगरीक इस्पाती आकाँक्षा
आ सार्थक मैत्रीक गीत बजाबै-ए
आउ हे! पाहुन नागर
अहाँकेँ सिन्दरीक स्वाद स' पाटल
शस्यश्यामला अपन खेत हकारै-ए
अहाँकेँ अगराइत गहुँमक सीस
आ अलबटाहि सरिसब
आ तीसीक फूल हकारै-ए।
कल-कल करैत नव नहरिक पानि
आ पयस्विनी नदीक
कूल हकारैए
दृढ़ता आ साहसक प्रतीक
राजेन्द्र आ गांधी पुल हकारै-ए
अहाँ आउ!
शांति, अहिंसा, आ प्रेमक गीत लेने आउ!
जाहि दुर्भेद्य एकता आ ऊर्जाक
सार्थक प्रयोगसँ भेटल स्वाधीनता
ओकरा नवनिर्माणमे लगाउ
स्वाधीनताकेँ महज पाबनि नै
पावन संकल्प बनाउ
अहाँ विकासक नव गीत लेने आउ
अहाँ आउ! अहाँ आउ! अहाँ आउ!
- पुस्तक : ऐ अकाबोन मे (मैथिली कविता-संग्रह) (पृष्ठ 25)
- रचनाकार : राज
- प्रकाशन : नवारम्भ, पटना
- संस्करण : 2011
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