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khoj

मैं आया हूँ

और यहाँ किसी को चाहता नहीं।

पीछे छोड़ता आया हूँ

उनको, जो मुझे भूल जाएँगे।

वहाँ सूर्य था

यहाँ आकाश नहीं।

वहाँ जल था,

यहाँ रेगिस्तान अनंत

और साद्यंत सप्रमाण रेगिस्तान।

यहाँ स्निग्ध भावनाएँ रुकी हैं।

यह मैं हूँ, वहाँ था अन्य।

वह रेगिस्तान है, वहाँ था जल।

जल का रंग नहीं।

रेगिस्तान की गति नहीं।

गति विराग है,

स्थिति विरंग।

विहंग है ही नहीं।

हाँ, है—

एक काला शाहमृग

दिगंत से ग्रीवा लंबी कर

मेरे संभ्रांत रणद्वीप की

कच्ची लहरियाँ चुगता है।

और वहाँ दक्षिण क्षितिज पर बैठ

सफ़ेद मोर

दीर्घ पिच्छकलाप को

खुजलाते समय

झड़ जाते उलटे पंख को

देखते समय

बीच-बीच में मेरी व्यस्त दृष्टि को

अपनी रिक्त आँखों में

सोख लेता है।

वहीं से आपन्नसत्व अश्रु

टपकेगा क्या?

और टपक जाए तो भी

उस मरीचिका में ही तो?

मेरे क्षण घोंसला ढूँढ़ते हैं

उस क्षितिज पर

कुछ नहीं।

आकाश नहीं सूर्य के बिना—

अवकाश है—निरानंद :

अर्थमुक्त अवकाश।

कुछ भी नहीं तभी तो सब कुछ।

मैं आया तो था

पर यहाँ तो

ये अन्य भाव से उभरते पदचिह्न के

अलावा कुछ नहीं।

रेगिस्तान और हवा।

सूर्य आए तो बताना कि

मैं मेरे अन्य को खोजता हूँ।

स्रोत :
  • पुस्तक : आधुनिक गुजराती कविताएँ (पृष्ठ 38)
  • संपादक : वर्षा दास
  • रचनाकार : रघुवीर चौधरी
  • प्रकाशन : साहित्य अकादेमी
  • संस्करण : 2020

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