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होंठ हँसे तो

honth hanse to

हरींद्र दवे

हरींद्र दवे

होंठ हँसे तो

हरींद्र दवे

और अधिकहरींद्र दवे

    होंठ हँसें तो फागुन

    गोरी! आँख झरे तो सावन,

    मौसम मेरी तुम ही,

    काल का मिथ्या आवन-जावन।

    तव दर्शन के पार सजन, दो लोचन मेरे अंध,

    अवर वाणी के काल श्रवण के द्वार कर दिए बंद,

    तुमरे एक ही संकेत से

    मेरे विश्व का संचालन।

    अणु सरीखा अंतर तव अपार यह अनुराग,

    एक था वीरान अब वहाँ लिख वसंती बाग;

    तव श्वासों का स्पर्श

    हृदय पर मलयलहर मनभावन।

    किसी के मन यह भरम, किसी मर्मी के मन का मीत,

    दो अक्षर भी भरे-भरे, प्रिय, भोगी ऐसी प्रीत,

    पल-पल पाती रही

    परम को मुदा ही में अवगाहन।

    स्रोत :
    • पुस्तक : आधुनिक गुजराती कविताएँ (पृष्ठ 16)
    • रचनाकार : हरींद्र दवे
    • प्रकाशन : साहित्य अकादेमी
    • संस्करण : 2020

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