उड़ गई माँ

और अधिकविश्वनाथ प्रसाद तिवारी

    उड़ गई माँ

    जैसे उड़ जाती है गौरैया

    अपने खोते से

    फूल रह गया था

    उड़ गई थी गंध

    दौड़े हम घर से अस्पताल

    और अस्पताल से घर

    लौट आए

    जैसे सब लौट आते हैं

    ले चले हम माँ को अपने कंधों पर

    उसके बेटे

    जो कभी बतख़ों की तरह डुगुरते थे

    उसके चारों ओर

    ले चले हम माँ को आँगन से

    जहाँ वह आई थी कभी

    कहारों के कंधों पर डोली में

    लाल-लाल दुल्हन

    चंदन नहीं था हमारे पास

    हमने लकड़ी की चिता बनाई

    माँ का आँचल जल रहा था

    जिसमें छिपाया करती थी वह हमें

    सबसे पहले पैर जले माँ के

    फिर सिर जला

    जल नहीं रहे थे

    माँ के अमृत पयोधर

    हमने लपटें तेज़ कीं

    और तेज़ कीं लपटें

    माँ अकेली लड़ रही थी

    लपटों से, हवा से, आकाश से

    सत्तर वर्षों का अनुभव था उसके साथ।

    स्रोत :
    • पुस्तक : आखर अनंत (पृष्ठ 24)
    • रचनाकार : विश्वनाथ प्रसाद तिवारी
    • प्रकाशन : राधाकृष्ण प्रकाशन
    • संस्करण : 1991

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