गोतियारो
gotiyaro
हम त नाहिंए लिहतीं दहेज
कइए दिहतीं बबुआ के मुफुते में मरेज
बाकी का करीं, का कहीं
हइ जपखेया गोतिया बदमास—भिखार ह, भिखार
अपना सतवाँ फेल पूता प
गिनवा लेलस सात हजार
त अब रउए कहीं, अपने से सोच-बिचार
कि अपना अठवाँ फेल ललना प
ना जे लीहीं आठ हजार
त हँस-हँस भरी कि ना गाँव-जवार
कि बुला खोंखड़ हो गइल
फलनवा सिंघ के परिवार
थोरहीं दिन में बोलबइन
पिछुत्ती के खेत में हुँडार
भला बेटा के, बिना दहेजे के, गरजे जे कइले बियाह
त बेटी में त, मुँहे दाँत दीहें चिहार!
से सुनीं, तनी बात बूझीं
आठे हजार दीहीं
बाकी गाँव-घर से दस-बीस हजार कहीं
अब हीत नाता भइनी हमार रउआ
राउर ईजत हम ना बूझब
हमार रावा ना बूझब
त के बूझी?—बँड़ेरी प के कउआ?!
- पुस्तक : बेटी मरे त मरे कुँआर [भोजपुरी कविता-संग्रह] (पृष्ठ 26)
- रचनाकार : प्रकाश उदय
- प्रकाशन : कौशल्या प्रकाशन, आरा
- संस्करण : 1988
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