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ग्लैमर

glaimar

रिदम राही

रिदम राही

ग्लैमर

रिदम राही

और अधिकरिदम राही

    रंग की वह पर्त है ग्लैमर

    जिसकी चमड़ी अलग है

    वह कुदरती चमड़ी के ऊपर

    अपना एक आवरण बना लेती है

    और चमकदार रोशनी से लबरेज़ रहती है

    रोज़ भागती इस मुंबई के

    सीएसटी, बाँद्रा जैसे स्टेशनों पर

    अलग-अलग शहरों, कस्बों और गाँव से आई

    कई लड़कियाँ,

    जिसे पाने की आस में उतरती हैं

    फिर सड़कों, समंदर,

    प्रोडक्शन हाउसों, स्टूडियोज़ की

    ख़ाक छानती हैं

    भागती मुंबई की तरह

    वह भी भागती हैं

    ग्लैमर

    जैसे मुंबई का सीलिंक ब्रिज

    (बांद्रा-वर्ली समुद्रसेतु) हो,

    जो किसी की रूह और देह के ऊपर

    इस तरह रखा होता है

    लोग उससे होकर गुज़रते जाते हैं

    और उस पर रखी

    चकाचौंध, चमक, नेम-फ़ेम में

    मंत्रमुग्ध हो जाते हैं

    ग्लैमर वह चाशनी है

    जिसमें डुबाकर

    किसी को यह बाज़ार

    ख़ुद तो चटकारे लेता हुआ

    अपना स्वाद बढ़ाता है

    और डूबने वाले को

    सिर्फ़ इसका स्वैग अच्छा लगता है

    यह एक उन्माद की तरह है

    जो पीछा नहीं छोड़ता

    और छोड़ दे तो

    जीने नहीं देता

    यह एक चक्रव्यूह है

    जिसकी रचना में

    लोभ, उलझनों, ईर्ष्या, द्वंद्व,

    क्षणिक सुख की दीवारें

    इस प्रकार खड़ी होती हैं

    कि अलग-अलग जगहों से आई हुई

    ये लड़कियाँ

    उसकी घेराबंदी में फँस जाती हैं।

    उनके पाँव,

    जो रुक-रुक कर बढ़े थे इस तरफ़

    कभी-कभी कुछ भी करने को तैयार

    वो घर की तरफ लौट पाती हैं

    जुहू और अक्सा चौपाटी में

    ये नहाता मिल जाएगा

    जिसकी रेत में

    नंगे पाँव कई ख़्वाहिशें चलती हैं

    और एक लहर के साथ पलक झपकते ही

    मायानगरी में

    भूख और हालातों के आगे

    घुटने टेकती हुई

    अनगिनत लड़कियाँ

    कई बार हार मानकर

    अपने फैसले बदलती हैं

    सच तो ये है

    ग्लैमर की चाह में

    सब कुछ वैध नहीं,

    पर मजबूरी का तमगा लगाकर

    वैध कर दिया जाता है

    झूठा सपना दिखाकर

    ये बाज़ार मुँह और आँखें सिलकर

    बेशर्मी की टेबल पर

    किसी का सारा जिस्म

    खोलकर दिखाता है

    फिर

    भूखे कुछ लोग

    उसका नाश्ता करते हैं

    बाज़ार की उँगली पर

    कठपुतली हैं सब

    पर काका पर फ़िल्माए

    उस गीत की तरह,

    यहाँ—

    “ये पब्लिक है, ये सब जानती है”

    किसको किस नज़र से देखना है

    इन सबसे परे

    ग्लैमर शॉर्टकट नहीं है

    जो चंद रुपये, नाम

    कमा लेने की होड़ से मिलता हो

    या केवल

    देह दिखाने मात्र से

    ये

    बेहोश होकर नहीं,

    होश से मिलता है

    पर ग्लैमर तो

    एक पर्दा है

    काँच का

    बहुत ही नर्म पर्दा

    और पर्दे के उस पार

    विदाउट मेकअप,

    विदाउट शोऑफ़ भी

    कोई लड़की

    कितनी ख़ूबसूरत होती है

    इसके पीछे

    हर उस लड़की की

    अपनी कहानी है

    कुछ कड़वी है

    अपने ग्लैमर वाले नाम के पीछे

    कुछ बेनामी है

    जो फ़ेमस तो नहीं,

    पर है सच्ची, साफ़

    वह,

    जो अलग-अलग शहरों, कस्बों

    और गाँव से आकर

    ग्लैमर की पर्त चढ़ाती है

    और इस मुंबई में

    लीन हो जाती है।

    स्रोत :
    • रचनाकार : रिदम राही
    • प्रकाशन : हिन्दवी के लिए लेखक द्वारा चयनित

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