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घूँघट

ghunghat

कंचन बुटोला

और अधिककंचन बुटोला

    स्त्रियों के घूंघट इतने नगण्य दिखते हैं

    कि इस सदी के अंत तक भी शायद ही उठ पाए।

    पितृसत्तात्मक समाज में स्त्री का घूँघट

    प्रतीक है उस मानसिकता का,

    जो सती होना भी जाएज़ समझता था;

    जो दहेज रूपी भीख मिलने पर

    भोखला उठता है—आज भी!

    जो बेटी होने पर अतीत को दोहराते हुए

    अपने डर को मातम बनाकर व्यक्त करता है;

    जो अभी भी कहता है, “तुम स्त्री हो!”

    अनकही खनक सुनाई देती है इसमें—

    पितृसत्ता की स्त्री बन कर रहो।

    “हाँ, हूँ मैं स्त्री;

    उससे पहले हूँ मैं एक स्वतंत्र व्यक्तित्व”,

    जो रखती है समाज की रूढ़िवादिता को जूते की नोक पर।

    यह कहने का साहस भरने में हमारी शिक्षा-व्यवस्था

    असफल रही।

    शिक्षा-व्यवस्था असफल रही

    एक स्वतंत्र समाज की नींव रखने में,

    ग़लत को ग़लत कहने में,

    आत्मज्ञान का रास्ता दिखाने में।

    जिसमें विषय-वस्तु का ज्ञान तो है,

    पर उसका अनुसरण कैसे करना है—

    उसे आत्म-प्रेषित करने की सुलभता नहीं है।

    जो पूँजीवाद की अंधी दौड़ में

    अहंकार से ओतप्रोत अपनी छवि

    और स्त्री को शरीर तक सीमित रखने में व्यस्त है।

    समाज की पाचनशक्ति

    पीढ़ियों से चली रही रूढ़िवादी

    दृष्टिकोण से इतनी कमज़ोर हो गई है

    कि स्त्री का कुशल होना

    इन्हें गांधारी बना देता है।

    स्त्री का कुशल होना इन्हें बौना बना देता है;

    फिर ये तिलमिला उठते हैं—

    पीढ़ियों से डरे हुए और डर जाते हैं।

    क्योंकि इनकी आँखों में चुभती है

    वह स्त्री—बिना मजबूरी की—

    जो घूँघट को चीर कर कमर कस चुकी है

    पितृसत्ता की कमर तोड़ने की।

    स्रोत :
    • रचनाकार : कंचन बुटोला
    • प्रकाशन : हिन्दवी के लिए लेखक द्वारा चयनित

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