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घर

ghar

नीरज दइया

और अधिकनीरज दइया

    तुमने और मैंने पाला

    हज़ार-हज़ार रंगों का / एक सपना।

    तुम्हारी और मेरी दृष्टि का

    तुम्हारे और मेरे सपनों का

    एक घर था / जो अब धरती पर

    कभी नहीं बनेगा।

    माँ कहती है / मूर्खता है

    घर होते हुए जंगल में भटकना।

    जला दे—नुगरे सपनों को

    जो दिलाते हैं थकान

    और करवाते हैं / व्यर्थ की यात्रा।

    स्रोत :
    • पुस्तक : आधुनिक भारतीय कविता संचयन राजस्थानी (1950-2010) (पृष्ठ 140)
    • संपादक : नंद भारद्वाज
    • रचनाकार : नीरज दइया
    • प्रकाशन : साहित्य अकादेमी
    • संस्करण : 2012

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