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घर

ghar

नरेश मेहन

और अधिकनरेश मेहन

    घर चाहे कैसा हो

    उसके एक कोने में

    खुलकर हँसने की जगह रखना।

    सूरज चाहे

    कितना भी

    दूर हो

    उसको घर आने का रास्ता देना।

    कभी-कभी

    छत पर चढ़कर

    तारे अवश्य गिनाना

    हो सके तो

    हाथ बढ़ाकर

    चाँद को

    छूने की

    कोशिश करना।

    अगर हो बांटना

    अपना दुःख-सुख

    करनी हो

    अपने दिल की बात

    तो घर के पास

    पड़ोस

    जरूर रखना।

    घर चाहे

    कैसा भी हो

    उसके एक कोने में

    खुलकर हँसने की जगह रखना।

    भीगने देना

    बारिश में

    उछल कूद भी

    करने देना।

    हो सके तो

    बच्चों को

    एक कागज की

    किस्ती चलाने देना।

    कभी हो फुरसत

    आसमान भी साफ़ हो

    तो एक पतंग

    आसमान में चढ़ाना।

    हो सके तो

    एक छोटा-सा

    पेच भी लड़ाना।

    घर के एक कोने में

    खुलकर हँसने की जगह रखना।

    अगर हो

    घर में बूढ़े माँ बाप

    हो दादा-दादी

    नाना-नानी

    तो थोड़ा-सा वक्त

    उनके साथ गुजारना।

    हो सके तो

    उनके चेहरों की

    झुर्रियों में छिपी

    कहानियों में

    एक आधी कहानी

    पढ़ आना।

    घर के सामने रखना

    एक वृक्ष

    उस पर बैठे

    पक्षियों की बातें

    अवश्य सुनना

    घर के एक कोने में

    खुलकर हँसने की

    जगह रखना।

    स्रोत :
    • रचनाकार : नरेश मेहन
    • प्रकाशन : हिन्दवी के लिए लेखक द्वारा चयनित

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