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गीत गीतों में सर्वोपरि

geet giton mein sarvopari

अनुवाद : श्यौराजसिंह जैन

यांको पोलिच-कामोव

यांको पोलिच-कामोव

गीत गीतों में सर्वोपरि

यांको पोलिच-कामोव

और अधिकयांको पोलिच-कामोव

    चलें, मेरी यायावरा, साँवरे प्रेम मेरे;

    श्यामल है वर्ण, लोचन भी श्याम तेरे;

    चित्रल हैं पग और स्निग्ध केश तेरे;

    सकल साँवरि, सकल वन-अल्हड़, साँवरे प्रेम मेरे।

    तेरे नयनों के क्रंदन से प्यार मुझे, तेरे वक्षों के

    क्रंदन से प्यार मुझे;

    उसमें है हमारा प्रेम, दर्द में ही होता नारी से

    प्रेम और दर्द ही संतान जनता;

    नग्न प्रेम मेरे।

    स्वतंत्रता में विशाल है तू, विशालतर प्रेम हमारा;

    प्रेम हमारा वन-सा तमस् और देवत्व-सा रक्तमयी;

    नारी मेरी है प्रथम नारियों में : रात्रि-सी काली, बदली-सी

    रहस्यमयी,

    मेरे चुंबन-सी अल्हड़, मेरी पंक्तियों-सी ध्वंसकारी।

    हमारा प्रेम विप्लव होगा : धुँधला और काल्पनिक और

    लोगों के पास उसके लिए उपयुक्त शब्द होंगे;

    हम नग्न और गर्म परस्पर चूमेंगें, चुभन हमारी रक्तमयी

    कविता होगी ;

    नोंच लूँगा केश तेरे, और तू अपने नेत्र मेरी आत्मा में

    छाप देगी और रौद्र होगी अभिशप्त कविता हमारी;

    नाग-से कुंतलित होंगे, आदर्श-से रेंगेंगे—त्रासदी

    हमारी निराश कविता होगी;

    स्तंभित करेगा हमें प्रेम हमारा—संत्रासों के बेंत लगाएगा

    और दर्द हमारी विकट कविता होगी;

    वन होगा मंदिर, कुश होगी शैया हमारी—विप्लव हमारा दैव,

    आत्माएँ हमारा बलि का बकरा।

    विप्लव में से फटक आएगा हमारा बच्चा—ओ मेरी

    अवैध पत्नी, मेरे अवैध प्रेम

    उसका नाम होगा : अवैध बच्चा ;

    भटकेगा संसार में भूखा हमारी वासना-सा, अभिशप्त

    हमारी कविता-सा

    और रक्तमयी हमारे प्रेम-सा;

    शाप पर शाप टूटेंगे उस पर, लोगों के बीच उसे स्थान मिलेगा;

    माँ को, बाप को भी कोसेगा, उनके प्रेम को भी,

    और गालियों से भर देगा लोगों से ईश्वर तक;

    पीड़ा और आतंक काँप जाएँगे जहाँ भी उसका पैर पड़ेगा,

    पाएगा वह सूखी रोटी का तिनका तक;

    पकड़ेंगे उसे, बाँधेंगे उसे, अपराध ही उसका भोजन होंगे।

    संसार मर चुका है, मेरे प्रेम, उसकी उकताहट में तमस् है;

    जनगण मर चुका है, मेरे प्रेम, निद्रालस है गीत उसका;

    झक्की है मौन, मेरे प्रेम, और मौन ही बोल उसका;

    देखो, उनींदे हैं वे और जँभाई बनी है संगीत नूतन;

    उनकी आत्मा सूनी है वेश्या की मुस्कान-सी, मुस्कान उसकी

    निर्जीव क़ानून के अक्षर-सी;

    क़ानून हैं उनके मानो उनका ईश्वर हो- उनका दैव भी

    हृदयहीन;

    एकरस है बलिदान उनका सिगरेट के धुएँ-सा और

    गंध जिसकी लोथ की गंध-सी;

    उनके नभलोक में तारे नहीं, बादल भी दूसरे हैं;

    सूरज उनका फीका है शवगृह की मोमबत्ती-सा, दीवारें उनका

    जंगल हैं;

    उजाड़ है, काला है, मेरे प्रेम, दिन भी उनके वैसे ही हैं जैसे

    विचार;

    उनके नेत्रों में अशांति नहीं, वे शूकरी के नेत्रों से हैं;

    उनकी गतियों में द्रोह नहीं और वे बेलों की चालों-सी हैं;

    उनके शरीरों में रक्त नहीं, उनकी आत्मा ईश्वर की भाँति

    सूनी है।

    वहीं फेंक देंगे अपना बच्चा, साँवरे प्रेम मेरे;

    वहाँ होकर भटकेंगे पैर उसके, उसकी गालियाँ दमकेंगी;

    वहीं काँपेगी आत्मा की लपट उसकी : विचार विध्वंस का,

    गति द्रोह की और साँस रोष की;

    वह ऐसा बनेगा जो सोते हुओं को जगाएगा, मृतकों को

    जिलाएगा;

    बेड़ियाँ उसकी वाग्दत्ता होंगी।

    हमारा अवैध बच्चा, अवैध माँ उसकी—

    अपराध-सा अनाम और भूख-सा एकाकी!

    हर्षध्वनि करेंगे हम अपने चुंबनों के स्वरों से, अपने रक्त की

    पूर्णता से :

    अनाम, तुम हमारे बच्चे हो!

    हमारी हर्षध्वनि होगी हर्षध्वनि प्रहर्ष की और प्रगल्भता की :

    विशाल ज्यों चिरता,

    लुंचन-सी वासनमय, वन के अँधेरे में नारी-सी लुभावनी।

    चलें, मेरी यायावरा, साँवरे प्रेम मेरे;

    प्रेम करेंगे विप्लव में, विप्लव से बच्चा उपजेगा,

    बच्चा हमारे रक्त का बच्चा हमारी आत्मा का,

    हमारे जीवन का।

    चलें, यायावरा, साँवरे प्रेम मेरे;

    बच्चा जनेंगे, अनाम बच्चा;

    उसे नाम देंगे, सुंदरों में से सुंदरतम;

    विक्रांति नाम होगा उसका, अवैध प्रेम हमारे!

    स्रोत :
    • पुस्तक : समकालीन यूगोस्लाव कविता-1 (पृष्ठ 31)
    • रचनाकार : यांको पोलिच-कामोव
    • प्रकाशन : ज़ाग्रेब, नई दिल्ली
    • संस्करण : 1978

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