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गाथा

gatha

सपने देखता हूँ घड़ी भर जो सोता हूँ, लेता हूँ करवटें

फिर और करवटें बिस्तर पर : जाग जाता हूँ।

दिन शुरू होता है या ढल जाता है

सपनों में उभरे किसी परदे से।

हल्का, वही बार-बार उसी रंग का

जो पलकों के अंदर का होता है।

दिन ढल जाता है या शुरू होता है

सपनों में आई किसी अधखुली खिड़की से।

मैं झाँकता हूँ, पहचान करता हूँ उस सड़क की

पहुँचती है जो मेरे घर तक। टोह लेता हूँ दूर से

अपने साये की जो पूरब से आता है और

चल पड़ता है रात की ओर। मैं क़रीब आता हूँ।

दिन शुरू होता है या ढल जाता है

किसी क्षितिज के ऊपर से उभरता है जो सपने में।

काँटेदार खेतों से होकर गुज़रता चला जाता है कोई।

स्रोत :
  • पुस्तक : यह संपन्नता बिखरी हुई (पृष्ठ 215)
  • संपादक : श्यामा प्रसाद गांगुली, मीनाक्षी संद्रियाल
  • रचनाकार : कवि के साथ अनुवादक श्यामा प्रसाद गांगुली, मीनाक्षी संद्रियाल
  • प्रकाशन : साहित्य अकादेमी एवं ग्रूलाक
  • संस्करण : 2006

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