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गर्मियों में पूनम की रात

garmiyon mein punam ki raat

अनुवाद : शिवम तोमर

जयंत महापात्र

जयंत महापात्र

गर्मियों में पूनम की रात

जयंत महापात्र

और अधिकजयंत महापात्र

    गर्मियों की इन पूनम रातों के पास

    सुनाने के लिए अक्सर

    वैसी कोई भी कहानी नहीं होती

    जिनमें गैस से भरे कमरों में रगड़ने के लिए

    माचिस की तीली अनुपस्थित हो,

    या एक अवास्तविक आकाश के सामने

    ताड़ के पेड़ों की तरह

    उग्रवादियों द्वारा गोली से मारे जाने के लिए

    गाँव के लोग क़तार में खड़े हों

    तितली के रूपांतरण में निहित

    अकेलेपन की कोई कहानी होती है

    दुर्गंध से जन्मी

    एक अर्थहीन कविता की कहानी

    लेकिन इस कहानी में जो मैं अब कहता हूँ

    नायक ने कोई गंभीर अपराध नहीं किया है

    केवल छोटे-मोटे अविवेक

    या कभी-कभार छोटे-मोटे झूठ

    झूठ जो एक बलात्कारी द्वारा

    डरी-सहमी बच्ची को मसल दिए जाने पर उठे सवालों के

    दुखद और भविष्यसूचक उत्तरों को दबा देता है

    इसलिए, इस कहानी का उद्देश्य

    साहस के कुछ शब्द ढूँढ़ना मात्र है

    यह जानते हुए भी कि बेआवाज़ हम

    उन्हें खो सकने में पूरी तरह समर्थ हैं

    यह एक ख़ाली मंच पर प्रस्तुत की गई कहानी है

    जिसका साक्षी एक भी दर्शक नहीं है

    क्योंकि इतिहास एक ऐसे लोहे के स्वप्न में बँधा है

    जो क्षरणग्रस्त है

    इसकी नायिका वह एक साधारण स्त्री भी हो सकती है

    जो अपने घुटनों में सिर घपाए बैठी है

    जिसका बच्चा उसकी पिंडलियों के सहारे टिका बैठा है

    भूख उसके शक्तिहीन माँस को निगल रही है

    फिर भी सीता की वंशावली पर उसका विश्वास अडिग रहता है

    इस कहानी में अंतर्निहित कोई अन्य कहानी नहीं है

    केवल ‘और कुछ भी चाहने’ की तीव्र वेदना है,

    कोई अधिकार, लालसा या प्रेम नहीं है

    वह स्त्री अपनी अंतरतम भावनाओं को

    उजागर कर रही है,

    अपनी प्यासी परछाइयों को धो रही है,

    थकी हुई दादी-नानियों के अधूरे स्वप्न को

    आज़ाद कर रही है

    तभी पूनम का चाँद

    एक साहचर्य की प्रत्याशा धूमिल करता हुआ

    थकी हुई नदी के ऊपर धीरे से सो जाता है

    एक साहचर्य जो उनके हलक़ में उलझी गुप्त सुबह से

    मुक्ति पा लेने का अवसर हो सकता था।

    स्रोत :
    • पुस्तक : सदानीरा पत्रिका
    • संपादक : अविनाश मिश्र
    • रचनाकार : जयंत महापात्र

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