एक :
रक्त है मेरा प्रकाश और मेरा अँधकार।
सुभागी दृष्टि नोंचकर आँखों के गड्ढों से
खोद ली गई मेरी स्वर्गीय रात;
क्रुद्ध अग्नि जो बनी दिवस की बूँदों से
जलाती लहू-लुहान पुतली मस्तक में ज़ख़्म-सी।
मेरी हथेली पर बुझ गई आँखें मेरी।
अवश्य ही अभी फड़फड़ा रही थीं चिड़ियाँ
आकाश ने करवट ली धीरे से, उनमें;
और मैं मौन था, लहू-लुहान मेरा चेहरा
नीला डूब गया पुतली में;
हथेली पर नेत्र किरणों से हँस रहे
और मेरे आँसू बह नहीं पा रहे।
उँगलियों के बीच से बूँदें टपकती रहीं
गर्म और गाढ़ी जो हत्यारे को मिलीं;
कितने कटु श्रम से मिलीं कोटरिकाएँ, जो तकतीं—
और क्रूर मेरे गले में छुरी भोंक दी :
कि हर गई मुझे इस रक्त की मोहकता,
चुप ही रहा मैं आँसुओं की बूँदों-सा।
भीषण रात से पूर्व का अंतिम प्रकाश
बिजली-से चाकू की चमक था,
श्वेत अब भी अन्धता में चीत्कार,
और श्वेत, श्वेत हत्यारे की त्वचा;
कमर तक क्योंकि नग्न थे सभी
यों दर्द की नग्न आँखें भी हमारी।
ओ दर्दीले प्रकाश, कभी भी गहन इतना
और तेज़ नहीं कौंधा भोर में,
अस्त्र में, अग्नि में; मानो मैं रोया
दहकते आँसू, जलती कोटरिका जिनसे :
और उस नर्क से चमकें सेकती रहीं,
चीख़ें पीड़ितों की कण काटती रहीं।
पता नहीं, कब तक रही रुद्र अग्नि,
जब जघन्य गाँठें कोटरिका की फूल उठीं
ठोस गोलों-सी और मुश्किल से उठा मैं।
तव चिकनी आँखें हथेली पर जानीं
और बोला : “अंधा हूँ प्रिय मेरी माँ,
अब तेरे लिए कैसे रो पाऊँगा…
शक्तिशाली प्रकाश, सौ ध्वनियों-सा
सफ़ेद घण्टों की, दमकता है
विक्षिप्त स्मृति में : प्रकाश सिओना का,
अद्भुत प्रकाश जो प्रकाश करता है!
जगमग पखेरू! जगमग पेड़, सरिता!
हे चंद्रमा! प्रकाश माता के दूध-सा!
पर इस भयंकर दर्द की प्रतीक्षा नहीं की मैंने :
हत्यारा बोला मुझसे : “कुचल दे अपनी आँखें!”
निभ्रांत मैंने तुरंत उसके समक्ष घुटने टेके,
जब दर्द ने मुट्ठी मेरी भिगो दी गाढ़े कफ़ से;
इससे अधिक न कुछ सुना न जाना मैं :
रसातल में ज्यों क़ब्र में गिर गया मैं
दस :
एकाएक मुझ तक गंध जलने की
पवन लाई मेरे गाँव की आग से;
गंध, जिससे सब स्मृतियाँ जगतीं :
सब शादियाँ, फसल कटाई, नृत्य और बैठकें,
दफ़न, दहन, सब संस्कार और शोकगीत वे;
जोवन ने बोए जो सब और मृत्यु ने काटे जो वे।
कहाँ है नन्हीं ख़ुशी, चमक शीशे की,
नीड़ अबाबील का, श्वास बाग़ीचे की;
जो झूलता कहाँ है झनक झूले की,
सूर्य की रेखा में स्वर्णिम धूल घर की?
तकली की गूँज कहाँ, रोटी की सुगंध कहाँ,
जो घर के झींगुर के संग सुख का जीवन मनाती;
आकाश के टुकड़ोंवाली कहाँ वे खिड़कियाँ,
चरमराहट धीमी द्वार को और देहरी पवित्र घर की?
कहाँ हैं घंटियाँ शाला की गायों की,
जिनकी आती मानो दूर से पुराने फ़र्श से आवाज़
स्वप्न में टपकती है; जब कि गिर गए तारे
शांति की सदियों के हमारे गाँव और कुल पर।
न कहीं रुदन, हँसी, गीत न अभिशाप कहीं।
चाँदनी चलती गाँव की आग पर चमकती हुई :
नीचे दूर से आती चश्मे की सिसक बुझ गई कहीं,
राह में कुत्ते की लाश काली पड़ती हुई...
बीमारी और पीड़ा को स्थान रह गया है क्या,
जहाँ मनुष्य जीवित ही भुगतता, तड़पता, गिरता हो?
हाथ रख सको ऐसा स्थान है क्या,
जहाँ तू अपने तईं दोषी के साथ रहता हो?
रह गया कोई स्थान जहाँ बच्चे चीख़ते हों,
जहाँ बाप के बेटी हो, बेटे के माता हो?
रह गया कोई स्थान जहाँ बहिन सिसकती हो,
भाई मृत बहिन के वक्षों को ढकता हो?
है कोई स्थान जहाँ खिड़की पर लगे फूल
अब भी ख़ुशी गुँजाते और दर्द शांत करते हों?
रह गए हैं क्या समृद्धि और सौभाग्य
जो संदूक़, बैंच और कुर्सी से बड़े हों?
जंगल से, पर्वत का चीत्कार लिए, विस्फ़ोट की गूँज
गरजती है। साथ ही गोलियाँ फटती हुईं
चीख़, मानो, उसके बच्चे हों। चीं-चीं की गूँज
ऊँची चारों ओर मेरी आवाज़ें खोती हुईं ।
लड़ाई लड़ी जा रही। प्रतिरोधी ललकारा देता!
मुझको दृढ़ उल्लास स्वास्थ्य-सा आभा देता।
हृदय में वतन के सभी चूल्हे भड़क उठे,
प्रतिशोध से फट पड़ी, बहे रक्त की
मेरी हर शिरा, और ज्यों दोपहर में
मुक्ति-सूर्य ने मेरी सब छायाएँ तोड़ दीं।
गाँव की आग के धुएँ की दिशा की ओर,
दौड़ता, उड़ता तुम्हारी गोलियों की ओर।
यहाँ पाया मुझे एक ओर पड़ा हुआ,
अनजाने वीरो, सगे भाइयो;
तुम गा रहे थे मानो दिन निकलता हुआ,
फैला प्रकाश, ईश्वर के प्रतीक मानो,
नहला रहा था मुझे। सोचा : क्या स्वप्न आ रहा था?
घाव बाँधे किसने? कौन गा रहा था?
कोमल नारी का हाथ माथे पर महसूस हुआ;
पार्तिज़ान हैं, कामरे! : मीठे स्वर सुना गए,
शांत हो! तुम्हारी पीड़ा का प्रतिशोध हुआ!
स्वर की ओर हाथ मेरे फैल गए,
कुछ न बोला मैं पहुँच गया कोमल चेहरे तक,
केश-राशि, बंदूक़ और परिचारिका के बम तक।
सिसकियाँ भरने लगा और अब भी रोए जाऊँ
एक गले से ही, आँखें तो रही नहीं,
एक हृदय से ही, आँसू कहाँ से लाऊँ
जल्लाद के अस्त्र से बह जो चुके हैं। रही नहीं
पुतलियाँ कि आपको देखूँ, शक्ति भी नहीं रही,
आपके संग युद्ध में जाऊँ—ओ दर्द! और इच्छा रही।
कौन हैं? कहाँ से? न जानता, पर तप रहा हूँ
आपके प्रकाश में। गाइए। यों चुप हो रहा हूँ
कि अब कहीं जी रहा हूँ, चाहे मर ही रहा हूँ।
पवित्र मुक्ति और प्रतिशोध का आभास कर रहा हूँ।
आपका गीत लौटा रहा मुझे प्रकाश आँखों का,
जनता-सा दृढ़ और ऊँचा सूरज-सा।
- पुस्तक : समकालीन यूगोस्लाव कविता-1 (पृष्ठ 100)
- संपादक : श्यौराजसिंह जैन
- रचनाकार : इवान गोरान कोवाचिच
- प्रकाशन : बाहरी पब्लिकेशंस, नई दिल्ली
- संस्करण : 1978
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