हाथा मारना

अष्टभुजा शुक्‍ल

हाथा मारना

अष्टभुजा शुक्‍ल

और अधिकअष्टभुजा शुक्‍ल

    उसने पूछा कि अब तक मैं कहाँ था

    मैंने बताया कि खेत में था

    उसने परिहास किया

    कि कृषिमंत्री, मुख्यमंत्री, उनके प्रतिनिधि

    तमाम लौह विचारक और योजनाकार

    उर्वरक और कीटनाशक

    हरियाली के जिंक और डंकल के बीज

    सभी तो किसानों के लिए हलकान हैं

    लेकिन तुम कवि आदमी खेत में क्या कर रहे थे?

    मैंने कहा कि हाथा मार रहा था

    वह चकरा गया और बोला

    हाथ तो जानता हूँ, हाथी समझता हूँ

    हथियाने की कला भी सीख चुका हूँ

    लेकिन यह हाथा मारना क्या होता है

    क्या यह आँख मारने, झख मारने या रेड़ मारने जैसा

    कोई मुहावरा है?

    मैंने कहा, पहली बात तो यह

    कि हमेशा मुहावरे में बात करना मुझे अच्छा नहीं लगता

    दूसरे, मैं स्वयं

    अपनी कविता का अर्थ बताने वाला कवि नहीं

    यानी मैं ऐसी कविताएँ लिखता हूँ

    जो लौटकर कभी कवि के पास नहीं आतीं

    तीसरे, काग़ज़ पर मैं उतना अच्छा नहीं लिख पाता

    इसलिए खेत में लिख रहा था

    अर्थात् हाथा मार रहा था

    उसने कहा

    तब तो यह हाथा निश्चय ही कोई स्थानीय शब्द होगा

    और तुम कविता में इतने भदेस शब्दों का

    इस्तेमाल करते हो

    कि कोई बैचलर लड़की तुम्हें प्यार नहीं कर सकती

    मैंने कहा, अव्वल तो मैं लिखने के लिए

    शब्दों पर निर्भर नहीं करता

    इसे यों समझो

    कि भाषा से क्रियाएँ संपादित नहीं करता

    बल्कि क्रियाओं से भाषा संपादित करता हूँ

    कुछ कर रहा होता हूँ

    तो समझो लिख रहा होता हूँ

    दूसरे, लिखना

    मेरे लिए प्यार करने का साधन नहीं है

    इस गप्पबाज़ी के बाद

    हाथा शब्द पर आता हूँ

    क्योंकि यह तुम्हें इतना आपत्तिजनक लग रहा है

    जैसे यह कोई आपत्तिजनक मुद्रा हो

    तो हाथा के लिए

    पहले बढ़ई के पास जाना पड़ेगा

    फिर जाना पड़ेगा लोहार के पास

    जिसने इसमें ठोंकने के लिए

    लोहे का बंद बनाया

    और कहा जाता है

    कि बढ़ई की अक़्ल तब काम करती है

    जब लकड़ी बढ़ी हुई हो

    और लोहार की तब भी काम करती है

    जब लोहा घटा हुआ हो

    समझ गया, समझ गया, वह बोला

    इसके माने हाथा

    कोई बेल्चे जैसी चीज़ है

    मैंने कहा,

    तुम शब्दों को पहेली की तरह समझने के आदी हो

    जब कि मैं उन्हें कहानी की तरह

    कहने में यक़ीन करता हूँ

    हाँ, हाथा काठ का बेल्चा ही है

    बेल्चे से ठोस चीज़ें उठाई और फेंकी जाती हैं

    जबकि हाथा से पानी

    जहाँ ज़मीन अचढ़ होती है

    वहाँ के पौधे

    हाथा के ही सपने देखते हैं

    उनके लिए पातालतोड़ कुएँ

    जैसे गूलर के फूल

    नहरें जैसे आकाश-गंगाएँ

    पम्पिंगसेट जैसे हाथी के सूँड़

    नदियाँ जैसे प्लास्टिक की साड़ियाँ

    हाथा का विकल्प केवल बादल हो सकते हैं

    लेकिन बादल ही भरोसेमंद होते

    तो हाथा की नौबत ही क्यों आती

    उसने कहा,

    कि किसान क्रेडिट कार्ड

    फ़सल बीमा

    कृषि अनुसंधान केंद्र भी तो

    हाथा के विकल्प हो सकते हैं

    और कविता के नए विषय भी

    तो क्यों तुम उसी गाँव, खेत और अटेलू-मटेलू में

    पड़े रहते हो कंठमाला की तरह

    मैंने कहा,

    जो खाऊँगा वही बताऊँगा

    जहाँ गया वही जगह

    जिससे मिला उसी का नाम

    पसीना गिराया तो ख़ून नहीं बता सकता

    सहयोग को सहायता नहीं कह सकता

    समझौते को सहअस्तित्व पुकारना मेरे बस की बात नहीं

    गद्य को कविता नहीं कह सकता तो नहीं कह सकता

    हरामी लोगों का कभी अकाल नहीं रहता

    इसलिए अब मैं

    लुप्त होती जा रही है चीज़ों पर

    इतनी ख़राब कविताएँ लिखना चाहता हूँ

    जिसमें कवित्व नाम की चीज़ हो

    और हो सके तो पढ़-सुनकर

    लोग मुझे गालियाँ और अभिशाप दें

    और छपाई कलाईकेंद्रों से बहिष्कृत कर दिया जाऊँ

    फुटपाथ पर दुकान लगाऊँ पांडुलिपियों की

    जहाँ पुलिस अपने डंडों से

    फाड़ डाले काग़ज़ों को

    हमारे वक़्त के

    कुछ चश्मदीद नमूने हैं :

    कि शब्दों के ख़ून छिटके हैं जगह-जगह

    कि सारे कुकर्म रोशनी में हो रहे हैं

    कि वक्तव्य से बड़ी भूमिकाएँ हैं

    कि रो रहे हैं नाख़ून और बाल

    कि ग़लत उद्धरण दिए जा रहे हैं

    कि किस सफ़े पर लिखा जाएगा इत्यलम्

    कुछ लोगों के लिए

    सोचने का काम फ़ायदे का है

    कुछ लोगों को कहीं गिरी हुई मिल गई है

    घोड़ा ख़रीदने की एक रसीद

    और वे अश्वारोही मान लिए गए हैं

    कुछ को मिल चुकी है त्रिभाषा फ़ॉर्मूले की सज़ा

    मुझे माफ़ करना

    अचढ़ ज़मीन के सूख रहे पौधों

    मैं जैसे हमला करने के लिए

    हाथा मार रहा हूँ

    आभासी परछाइयों से पटे

    ज़िबह किए गए मौसम

    अनभ्यस्त उरोजों

    और चूतड़घिस्स के इस पर्व के पूर्णाहुति पर

    मेरे हाथा मारते हुए हाथों को पकड़ लो

    इसके पहले कि

    ठीक हो जाए ट्रांसफ़ॉर्मर

    और फ़ोन नेटवर्क बिजी रटना बंद कर दे

    हम कोई झरना पकड़ कर लटक जाएँ पहाड़ों से

    किसी कैमरे के क्लिक होने से पहले

    अब भी

    सुबह-सुबह सूरज

    धूप की अपनी दरी बिछा देता है

    कि जगत के सारे दीन-हीन-बैठकर

    पंचायत कर सकें

    कि किधर मोड़ना है वक़्त को

    पानी का मुँह किधर हो

    और किधर हो बिजली का मुँह

    टेलीफ़ोन का चोंगा उलटा रखा जाए या सीधा

    कि बर्रोह की तरह सारे तार नोंच कर

    हिंद महासागर में फेंक दिए जाएँ?

    किसान यूनियन की

    हरी-हरी टोपियों का मुँह

    सुग्गों की तरह सुर्ख़ हो गया है

    उनके पंजों में टांस लगी है

    और पंखों पर

    हेलीकॉप्टरों से किया गया है

    शहद का छिड़काव

    सोंटों के नथुने फड़क रहे हैं

    सड़ी हुई प्याज़

    सड़ा हुआ आलू

    और खेतों में अपने हाथों जलाए गए गन्नों के साथ

    आत्महत्या की लाशों की समवेत बू

    लालक़िले के ऊपर मँडरा रही है

    इत्र में भीगी रूमालें हलकान हैं

    कि यह किसानों का देश है या श्मशान है

    धरती को भी

    कई बार दिल का दौरा पड़ चुका है

    पृथ्वी सूक्त की रचना करने वाले ऋषि

    शेषनाग, गैलीलियो, धन्वंतरि और उपग्रहों को

    भेजे गए हैं परिपत्र

    कि वे पहुँचे ह्वाइट हाउस

    दशमलव तीन तीन तीन सेकंड के भीतर

    चिंता कोई मामूली चीज़ नहीं

    आम आदमी का बदन ही

    उसका निवास-स्थान है

    लेकिन किसी ख़ास आदमी को

    वह आँखों से भी दिख जाए तो

    वह बार-बार ठीक करता है अपना नेकटाई

    उसे तुरंत ज़ुकाम हो जाता है

    कि इस पृथ्वी बचाओ सम्मेलन में

    हिस्सा लेने वालों के माथे पर

    दिखाई देनी चाहिए चिंता की लकीरें

    थोड़ा पसीने का प्रबंध हो जाए तो और अच्छा

    चेहरों पर चेचक जैसे दुख

    और दुरात्माओं को भगाने के लिए

    सुलगती रहे चाँदी की अँगीठी में लोहबान

    अबकी जगदीश चंद्र बसु ने

    इस पृथ्वी बचाओ महोत्सव की

    अध्यक्षता करने से इनकार कर दिया तो क्या

    हरियाली के अचार

    काँच के पारदर्शी ज़ारों में सजाए गए हैं

    पानी के हाथों को पीछे से बाँध दिया गया है

    और नवजात हवा नाक रगड़ रही है उन फ़र्शों पर

    जिन पर मृगचर्म के जूतों की

    परछाइयाँ बिलख रही हैं

    इस प्रदर्शनी में

    खेती के सारे औज़ार

    क़रीने से लगाए गए हैं

    धार से कम

    और अपने भार से ज़्यादा काटने वाला

    वह आदिकालीन गड़ासा भी है

    नोक से कम

    अपनी झोंक से अधिक खोदने वाली

    ब्रह्मकालीन खंती भी है

    मूठ से कम

    झूठ से बेसी चलने वाली खुरपी

    और तनी एकनली की तरह ढेंकली

    जिसमें बरहे से बँधी सरगपताली कूँड़

    आपके दिमाग़ को

    चकराए बिना नहीं छोड़ सकती

    ऐसे ही कुदाल, हँसी जैसी हँसिया

    और भूत के पिछले पाँव की तरह फावड़े

    जिन पर मिट्टी का एक भी कण नहीं

    यहाँ मैं भी दिख जाऊँगा

    अँगूठा लगाते हुए

    जिसे प्रमाणित करेगा कोई सक्षम अधिकारी

    कि मैं कोई धाँधली नहीं कर सकता

    कि मेरी पहचान करने वाला कोई है इस चौथी दुनिया में

    दर्शन नगर से देखने वाले आए

    ज्ञानपुर से समझने वाले

    प्रेमनगर से कई रसिया

    दूसरी दुनिया के कुछ दंगा विशेषज्ञ

    और मरने पर आए वैद

    तथा पृथ्वी पर कविता लिखने वाले कवि

    किसी ने बताया कि पृथ्वी का नमक कम हो गया है

    तो चलाना चाहिए नमक आंदोलन

    किसी ने पूरक प्रश्न उठाया

    कि चार महीने रजस्वला रहती हैं नदियाँ

    तो सिरे से दूर नहीं हो सकता प्रदूषण

    प्रेमियों का कहना था कि खिन्नमना वसुधा को

    धीरे-धीरे चूमना चाटना चाहिए

    दंगा विशेषज्ञों ने चेतावनी दी

    कि संतुलन बनाए रखने के लिए

    जहाँ जिस मज़हब के जितने अधिक लोग हों

    उन्हें क़त्ल कर देना चाहिए

    कवियों की राय थी

    कि शब्दों में मधु, घी, शिलाजीत, राख,

    साही के काँटे

    या सोडियम-रेडियम जैसे तत्व

    भर देने चाहिए

    विचारों के डिसपोज़ेबल सिरिंज़ से

    राष्ट्राध्यक्षों और पर्यावरण मंत्रियों ने

    पक्का आश्वासन दिया

    कि पृथ्वी को बचाने के लिए

    झोंक दी जाएगी सारी ताक़त

    आने पाएगी बाढ़

    जाने पाएगा सूखा

    असिंचित रहेगी सूच्यग्र भूमि

    कुछ नहीं तो बीच में खड़ा कर दिया जाएगा

    उत्तोलक का सिद्धांत!

    हाथा मारते-मारते

    मेरे पखुरे भर गए हैं

    अचढ़ ज़मीन पर पानी चढ़ाते-चढ़ाते

    पानी में खड़े-खड़े

    मेरे हाथों और पैरों की चमड़ी

    सिकुड़ कर सफ़ेद हो रही है

    कमर दर्द कर रही झुके-झुके

    चूर-चूर हो रहा है बदन

    यह जानते हुए भी

    कि थूक चटाकर मुसरी नहीं जियाई जा सकती

    मूत-मूत कर धान नहीं उपजाया जा सकता

    पहले छेद पर ही रखी हो उँगली

    तो फू-फू करके रह जाएगी बाँसुरी

    सूप पीट-पीट कर

    भगाया जा रहा है दलिद्दर

    अंडे और कुम्हड़े फोड़-फोड़ कर

    तड़फड़ाए जा रहे हैं प्राण

    अगरबत्ती सुलगा कर

    भरी जा रही है कोख

    और मैं और मेरे जैसे

    जाने कितने शुष्कमति

    जाने किस उम्मीद में

    हाथा मारे जा रहे हैं अचढ़ ज़मीन पर

    सारा पानी ढुलक कर रहा है

    हमारे ही पैरों की ओर

    तो मैं पागलों की तरह आँख मूँद कर

    ऊपर की ओर

    उछालने लगता हूँ पानी

    जैसे आसमान ही

    संसार का सबसे बड़ा रेहार है

    तीन हाथ की सीढ़ी ठहरी

    सात हाथ के पाँव

    आसमान में हाथा मारें

    लड़बक पूरा गाँव!

    झरती ओस के परदे में

    अभी-अभी निकला

    पंचमी का पीला चाँद

    गरम सरसों के तेल की कटोरी जैसा

    पुरसा बराबर दिख रहा है

    जिसे एड़ी उठाकर

    अभी मैं उतार लूँगा

    और आहिस्ता-आहिस्ता मालिश करूँगा

    अपने थके, हारे और सिहरते बदन पर

    भविष्यवाणियों का

    बाज़ार गर्म है

    क्या पता कि किसके चमक जाएँ कब सितारे

    कौन छू जाए पारस से

    कौन पड़ जाए रामानंद की खड़ाऊँ के नीचे

    किसके दाहिने दिख जाए नीलकंठ

    और किसकी रुकती छींक के सामने

    कौन बन जाए सूरज?

    एक कलारहित रुलाई

    मेरे गले में अटकी है

    मेरे गालों पर ढुलके हैं

    कटे बबूल के लासे जैसे आँसू

    जिसे हँस-हँसकर चाट रहे हैं कुत्ते

    मैं डर रहा हूँ

    कुत्तों के दाँतों की रैबीज से

    और ख़ुश भी हूँ

    उनकी अमृता जीभ की कल्पना से

    जिससे चाट-चाटकर

    वे अपना बड़े से बड़ा घाव ठीक कर लेते हैं

    अगर घाव गर्दन पर हो तो!

    तो मैं हाथों में हाथा पकड़े-पकड़े

    यानी काठ का कोई बहुत बड़ा चम्मच

    यानी पानी उलीचने का बेल्चा

    यानी खेतों में प्यासे पौधों का सपना पकड़े-पकड़े

    निंदियाया हूँ

    कभी स्त्री-पुरुष योग देखता हूँ

    तो कभी स्त्री-स्त्री योग

    कभी हाइड्रोजन-ऑक्सीजन योग देखता हूँ

    कभी कदली स्तंभ और हँसिया योग

    और जैसा कि घोषित किया जा चुका है

    कि अगला युद्ध पानी के लिए लड़ा जाएगा

    तो मैं दूध की ओर खड़ा होऊँगा

    कि ख़ून की ओर

    कि तेल की ओर

    कि ओस की ओर

    पौधों की ओर कि बादलों की ओर

    प्यास की ओर कि पखारने की ओर

    मंडूक की ओर कि मूषक की ओर?

    हमारे असमंजस ही

    हमारे दुख हैं

    कविता की खेती में

    जितने सुख हैं

    खेती की कविता में

    उतने ही दुख और असमंजस

    दुख की कुछ

    कलमी क़िस्मों में

    समस्याओं की मंजरियाँ निकल रही हैं—

    किसी भी विधि से

    देश को घायल, अपाहिज या लूला-लँगड़ा बनाकर

    प्रकट होने के लिए

    सहानुभूतियाँ मचल रही हैं—

    सहानुभूतियों की पैंसठ अदाएँ

    और इतनी ही कलाओं की कलाएँ

    किसके उसमें जाएँ?

    जबकि अनाथ दुख

    कुछ दूसरे क़िस्म के हैं

    हाथ-हाथ भर के खेतों में

    हाथा मारना है

    चमगादड़ की तरह टूटे छाते से

    धूप रोकना है

    नमक का टुकड़ा चाटकर

    पानी पीना है

    और सभ्य बनने से बचना है

    हमें नहीं मालूम कि

    दुखों को सींचने के लिए

    किस-किससे बना पानी चाहिए

    अगर वर्षा ऋतु आई

    तो तालाबों के महा कड़ाह में

    उपराएँगे मैथुनरत मेंढक

    जिन्हें पकौड़ों की तरह देखेंगे साँप

    शरद ऋतु में

    तालाबों की सतह से उठेगी भाप

    जो पशु-पक्षियों के लिए

    होगी चाय का विकल्प

    लेकिन गर्मियों में

    मेंढक चले जाएँगे रसातल में

    तालाबों में

    छूने भर को

    पानी वानी नहीं होगा

    और पशुओं के नासापुटों से

    चूवेगी लार

    फ़िलहाल मैं

    काग़ज़ से बाल-बाल ऊपर

    या मीटर भर नीचे

    हाथ थामे खड़ा हूँ, खेत में

    अगर हाथा कोई क़लम हो तो!

    परिहास करते-करते

    उसने उपहास किया

    कि कविता में

    अब तो खेती के सारे औज़ार चुके हैं

    यही हाथा मारना भर बाक़ी बचा था...।

    स्रोत :
    • रचनाकार : अष्टभुजा शुक्ल
    • प्रकाशन : हिन्दवी के लिए लेखक द्वारा चयनित

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