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एकतीस दिसम्बरक राति

ektis disambrak rati

दीप नारायण

दीप नारायण

एकतीस दिसम्बरक राति

दीप नारायण

और अधिकदीप नारायण

    ...की गोधूलिकेँ करोट फेरिते

    अन्हार गुज्ज रातिमे निसभेर भेल

    सुतल अछि चारू भर दुनिया

    हम एसगर बैसल छी उनीन्ने।

    ओह!

    हम किछु आर रहितहुँ

    कतेक निचेन रहितहुँ हमहूँ

    हमर मोसकिल अछि—

    की हम कवि छी

    जगएबाक अछि हमरा

    सभ सुतलाहा सभकेँ...

    मध्यमा ओँरीमे, बुन्नी भरि सुनौली भोर नेने

    जागहे पड़तै

    तखने हेतैक एकटा

    विशाल सुरुज केर प्रस्फुटन।

    नहि त’

    पुरने साल जकाँ...

    'ग्लोबल वार्मिंग'सँ त्रस्त हएत जीवन

    घोट' पड़त आतंकवादक बिख

    भ्रष्टाचारक जाँतमे पिसाइत

    आत्महत्या करत किसान

    धर्म, जाति भाषाक जुन्नामे गछारल देस

    मोहनजोदड़ोक देबाल पर पीठ अड़कौने

    पाँच सालक बेटीक देह पर देखि हवसकेँ चेन्ह

    डेराएत लहासक शिनाख्तसँ...।

    एहनामे कतबा सुखद अछि देखब

    जे तीन सए पैंसठ गोट घाओकेँ भोगैत पिरथी

    कतेक आगि समेटने अपना भीतर

    आइ आएल अछि सोझाँ

    नया सालक देहरि पर

    पिरथीक जनबाक प्रक्रियामे

    कतबा दुख अङेजने हम लिखैत छी कविता

    तखन, कोन नयका साल

    हमरा साल नया नहि चाही

    चाही हमरा

    नया समय!

    जेना, बीति जाइत छैक

    जाड़, गर्मी बरसात

    गाछ चिड़ै-चुन्मुन्नी

    दिन, सप्ताह मास

    बीति गेल साल जेना,

    जेना, बीति रहल छी हम

    इहो साल तहिना बीति जाएत।

    एहनामे कोना कहू...

    नया सालक शुभकामना!

    रातिक बारह बाजएमे एखन,

    बहुत देर अछि।

    एकतीस दिसम्बरक आधा राति

    एतेक भयाओन किएक

    लागि रहल अछि भाइ।

    स्रोत :
    • पुस्तक : आब कतेक चुप रहू (मैथिली कविता-संग्रह) (पृष्ठ 91)
    • रचनाकार : दीप नारायण
    • प्रकाशन : राजकमल प्रकाशन, नई दिल्ली
    • संस्करण : 2021

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