Font by Mehr Nastaliq Web

एकरे लोक कहै छै उनटन

ekre lok kahai chhai untan

चन्द्रनाथ मिश्र ‘अमर’

चन्द्रनाथ मिश्र ‘अमर’

एकरे लोक कहै छै उनटन

चन्द्रनाथ मिश्र ‘अमर’

और अधिकचन्द्रनाथ मिश्र ‘अमर’

    एकरे लोक कहै छै उनटन,

    बेटा सब बेटी सन लागय, बेटी लागय बेटा सन।

    पुरुष अपन पुरुषार्थक बलपर, परिवारक करइत छल पालन,

    सम्प्रति पत्नीकेर कमाइक, बलपर युवक करै छथि सन-सन।

    जतय कुकर्मी अपन कुकर्मक, लाजेँ घाड़ खसाय चलै छल,

    ततय आइ लुच्चा-लम्पट सब, चढ़ल मंचपर करइछ गर्जन।

    बदलल सकल समाज व्यवस्था, किन्तु अवस्था बदलि सकले,

    बड़दक हेतु जुड़य नहि गूड़ा, किन्तु कुकुर लय बिस्कुट भोजन।

    भारतीयता कोना मेटायत, तेहन विधान गढ़ल जाइत अछि,

    जे नहि रहय स्वयम् अनुशासित, तकरे हाथ स्वदेशक शासन।

    झोँटा छँटबथि आब किशोरी, किशोर चुरकी बढ़बै छथि,

    महिला दै छथि ताव मोँछ पर, पुरुष कराबथि तकरे मुण्डन।

    नुक्कड़पर लुक्कड़ सब बैसल, गिरहकट सब भीतर पैसल,

    डेढ़ सेर भोरे भकोसि कऽ, दिन भरि कहय करै छी अनशन।

    नहि विभाग लय मन्त्री चाही, मन्त्री लेल विभाग विभाजन,

    वर्षे भरिमे ततबा चाही, ली निमाहि कहुना आजीवन।

    अपने जे सिद्धान्तहीन अछि, सैह आइ सिद्धान्त बघारय,

    दोगला बढ़य देशमे तेहि लय, भेटय सरकारी प्रोत्साहन।

    भिनसर जे आश्वासन दै अछि, साँझे तेहिपर थिर रहै अछि,

    अपने मुँहसँ अपने बातक सात बेर करइत अछि खण्डन।

    स्रोत :
    • पुस्तक : चन्द्रनाथमिश्र ‘अमर’ रचना संचयन (पृष्ठ 392)
    • संपादक : योगानन्द झा, शम्भुनाथ झा, विजयदेव झा
    • रचनाकार : चन्द्रनाथ मिश्र ‘अमर’
    • प्रकाशन : साहित्य अकादेमी, नई दिल्ली
    • संस्करण : 2025

    Additional information available

    Click on the INTERESTING button to view additional information associated with this sher.

    OKAY

    About this sher

    Close

    rare Unpublished content

    This ghazal contains ashaar not published in the public domain. These are marked by a red line on the left.

    OKAY