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एक पत्र का आरंभ

ek patr ka arambh

अनुवाद : श्यौराजसिंह जैन

दानियल द्रगोयेविच

दानियल द्रगोयेविच

एक पत्र का आरंभ

दानियल द्रगोयेविच

और अधिकदानियल द्रगोयेविच

    कहते हैं कि ईश्वर नहीं है।

    शायद

    पर ऐसा तो मैं अपने लिए भी सोचता

    किस लिए नहीं तो

    सारी सुबह

    जब कि बाग़ में गुलाब बढ़ता है

    नीचे से ऊपर को

    और धीरे-धीरे खिलता है

    मैं सोचना चाहता हूँ

    और कहना

    कुछ महत्त्वपूर्ण।

    क्या यह काम है किसी का जिसका अस्तित्व हो?

    और अंत में

    अनुभव करते हैं

    पढ़ा हमने,

    कहा गया हमसे

    ईश्वर और कुछ भी नहीं करेगा

    अपना

    हमारा

    सिवाय कुछ ऐसे के जो पुनः नहीं घटेगा।

    क्या यह काम है किसी का जिसका अस्तित्व हो?

    नहीं हूँ मैं पूर्णतया निश्चित ईश्वर के बारे में

    अपने बारे में पर जानता हूँ

    कि मैं अकारण ही थका हुआ हूँ

    कि वस्तुतः

    मेरा अस्तित्व नहीं है,

    परंतु यदि उसका भी यही हाल है

    तो भी उसको बुलाने से बाज़ नहीं आऊँगा,

    उसको जिसने मुझको रचा है

    अपनी छवि और परिस्थिति के अनुरूप।

    दरअसल मैं प्रत्यक्ष रूप से ऐसा नहीं करूँगा,

    वह तो मूढ़ता होगी उसके लिए भी मेरे लिए भी

    हमारे लिए जिनका कि अस्तित्व नहीं है

    जैसी कि हमसे अपेक्षा की जाती है,

    पर जो भी कहता हूँ उसके बारे में सोचकर ही कहता हूँ,

    अर्थात् कुछ महत्त्वपूर्ण और विस्तार से, अपने बारे में भी,

    ऐसा ही कुछ असाधारण।

    वह जो उसका अस्तित्व नहीं, और जो मेरा अस्तित्व नहीं

    मेरे शब्द को अधिक मौजी

    अधिक उत्तरदायित्वरहित बनाता है और मैं बोल सकता हूँ

    बिना कुछ खोए।

    अब ज़रा लौट आएँ पूर्व उल्लिखित गुलाब तक।

    इसी बीच, जब तक कि मैं इन शब्दों से तैयार होता रहा

    आपको लिखने के लिए, गुलाब खिला और किसी

    दूसरी ओर झुक गया,

    मेरी खिड़की की ओर जहाँ अंततः सब ठीक है,

    और मैं गुलाब से प्रसन्नचित्त कहता हूँ :

    प्रिय, वहाँ सभी अपनों को मेरा अभिवादन कहना,

    उन्हें चूम लेना।”

    स्रोत :
    • पुस्तक : समकालीन यूगोस्लाव कविता-1 (पृष्ठ 170)
    • संपादक : श्यौराजसिंह जैन
    • रचनाकार : दानियल द्रगोयेविच
    • प्रकाशन : बाहरी पब्लिकेशंस, नई दिल्ली
    • संस्करण : 1978

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