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एक न ख़त्म होने वाली बहस के बाद

ek na khatm hone vali bahs ke baad

अनुवाद : सुरेश सलिल

इशिकावा ताकुबोकु

इशिकावा ताकुबोकु

एक न ख़त्म होने वाली बहस के बाद

इशिकावा ताकुबोकु

और अधिकइशिकावा ताकुबोकु

     

    जिस तरह हम पढ़ते हैं

    जिस तरह हम बातें करते हैं

    जिस तरह हमारी आँखों में चमक आती है—

    सब कुछ मेल खाता है आज से पचास साल पहले के

    रूस के नौजवानों से।

    हमें क्या करना चाहिए, इस पर हम सलाह-बात करते हैं

    लेकिन एक भी नहीं है ऐसा आदमी

    जो अपनी कसी हुई मुट्ठी मेज़ पर मारकर

    एलान करे : ‘आवाम के नाम पर!’1

     

    हम जानते हैं हमें किस चीज़ की तलाश है

    आवाम के किस चीज़ की तलाश है, हम जानते हैं

    हमें क्या करना चाहिए, हम यह भी जानते हैं

    पचास साल पहले के रूस के नौजवानों से

    कहीं ज़्यादा जानते हैं,

    लेकिन एक भी नहीं है ऐसा आदमी

    जो अपनी कसी हुई मुट्ठी मेज़ पर मारकर

    एलान करे : ‘आवाम के नाम पर!’

     

    यहाँ मौजूद सारे लोग नौजवान हैं

    और नौजवान लोग ही

    दुनिया को नई-नई जानकारियाँ देते हैं,

    हम सभी को मालूम है

    कि पुराना सड़ा-गला; सब कुछ जल्दी नष्ट हो जाएगा

    और जीत हमारी ही होगी,

    देखो, हमारी आँखें किस तरह चमक रही हैं

    और बहस कितनी गर्मा उठी है

    लेकिन एक भी नहीं है ऐसा आदमी

    जो अपनी कसी हुई मुट्ठी मेज़ पर मारकर

    एलान करे : ‘आवाम के नाम पर!’

     

    ओह, हालाँकि तीन-तीन बार मोमबत्तियाँ बदली जा चुकी हैं

    चाय की प्यालियों में पतिंगे तिरने लगे हैं

    और नौजवान औरतों में हरदम की जैसी उत्कंठा है—

    एक लंबी बहस के बाद

    उनकी आँखों में थकान झलक रही है,

    इसके बावजूद एक भी नहीं है ऐसा आदमी

    जो अपने कसी हुई मुट्ठी मेज़ पर मारकर एलान करे :

    ‘आवाम के नाम पर!’

    स्रोत :
    • पुस्तक : रोशनी की खिड़कियाँ (पृष्ठ 83)
    • रचनाकार : इशिकावा ताकुबोकु
    • प्रकाशन : मेधा बुक्स
    • संस्करण : 2003

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