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एक कमरे में

ek kamre mein

आशीष गौड़

आशीष गौड़

एक कमरे में

आशीष गौड़

और अधिकआशीष गौड़

    एक कमरे में सिर्फ़ एक ही कमरा नहीं होता,

    एक घर में सिर्फ़ उतने ही कोने नहीं होते।

    नीली शामें, जहाँ सुबह का उजाला सोख लेती हैं,

    स्थूलता का प्रतिबिंब ओढ़े खड़ी रहती है उत्तेजना जहाँ।

    अपनी सभी मान्यताओं के सामने खड़ा वह कमरा

    दोहराता रहता है सभी कमरों से एक ही बात जैसे।

    वही बात, जो चारों कोनों और षट्भुजाओं से टकराकर

    आख़िर दम तोड़ देती है

    और छिपकली की कटी पूँछ-सी हिलती रहती है।

    एक कमरे में सिर्फ़ एक ही खिड़की होती है,

    जो खुलती है अक्सर अंदर से बाहर की ओर।

    उस कमरे की खिड़की बाहर से अंदर ही खुलती है,

    बहुत-सा सब कुछ समाता रहता है अंदर।

    गीली दीवारें अपनी नमी सोखती खपलियों-सी

    पूरी किताब की चुनिंदा कविता कहती हैं।

    अक्सर उत्कृष्ट नहीं होता जो लिखा गया होता है।

    इन कमरों में लिखी कविताएँ सिर्फ़ वेदनाएँ ही नहीं होतीं।

    सारे घर को अपने ऊपर ओढ़े, बैठा वह कमरा

    एक कोने में खड़ा निर्वेग स्थिर हो जाता है।

    धीरे-धीरे समय के साथ-साथ

    कमरा सिर्फ़ दीवार बन जाता है।

    उसकी सभी दीवारें

    एक दीवार और एक कोने में बदल जाती हैं।

    उसकी खिड़की अब सिर्फ़ खुली रहती है,

    जहाँ से दिखता है सिर्फ़ उतना ही आसमान,

    लेकिन रात का पूरा घना अँधेरा।

    और जहाँ से नज़र आता है

    सामने वाले जंगल का एक बदनाम पेड़,

    इर्द-गिर्द जिसके कभी-कभी कोई आया-जाया करता है।

    एक कमरे में सिर्फ़ एक ही कमरा नहीं होता,

    एक घर में एक और कमरा छुपा होता है।

    स्रोत :
    • रचनाकार : आशीष गौड़
    • प्रकाशन : हिन्दवी के लिए लेखक द्वारा चयनित

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