एक दिन अँधेरे में
ek din andhere mein
घर लौटने पर एक दिन मैंने पाया कि मेरा पंसदीदा शैतान मेज़ पर रोशन
मोमबत्ती को फूँक मारकर बुझा रहा है। फिर, अँधेरे का चोगा पहनकर,
यूँ ही चलता हुआ वह मेरे बिस्तर पर जा बैठा, और अपनी रुग्ण मुस्कान
बिखेरते हुए, दूसरी मायावी चेष्टाओं के साथ, उसने कहा, ख़ुदा की
सरज़मीं पर आपका स्वागत है। वर्जित प्रदेश को पारकर, बात की बात
में, मैं सुदर्शन प्रज्ञा-वृक्ष के नीचे जा पहुँचा। मैंने कहा, यह तीक्ष्ण कटार
मेरी है, या ख़ुदा, मुझे अलौकिक साहस दो, ताकि उसकी सहायता से मैं
वह प्रीति-फल तोड़ सकूँ और अपनी प्रियतमा के साथ उसकी
हिस्सेदारी कर सकूँ।
- पुस्तक : रोशनी की खिड़कियाँ (पृष्ठ 441)
- रचनाकार : अल महमूद
- प्रकाशन : मेधा बुक्स
- संस्करण : 2003
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