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एक अनाम कविता

ek anam kavita

सुशील कुमार

सुशील कुमार

एक अनाम कविता

सुशील कुमार

और अधिकसुशील कुमार

    आकाश क्या है,

    निर्वात है यह, या कि नीलाभ है

    या आँखो का भ्रम केवल

    लेकिन आकाश आशा भी है

    उमंग भी है

    ज़मीन से जब आदिमानवों ने आकाश को निहारना शुरू किया

    तभी वे तनकर खड़े हो पाए!

    मान भी लें कि आकाश कुछ नहीं है

    तो भी उसमें जीने की आशा और जीवन के रंग है।

    आकाश में उगा पनसोखा क्या है,

    यह भी तो दृष्टिभ्रम ही है सात रंगों का

    धूप, बारिश और आँखों के बीच का जादू भी कह सकते हैं

    लेकिन मन और मोर दोनों नाच उठते हैं इसे देखकर।

    यौवन क्या है

    धोखा है जीवन के एक अंतराल का

    उसे तो ढलना ही है धीरे-धीरे

    भला कौन रोक पाया उसकी ढलान को!

    फिर भी जीवन का सर्वांश है यह

    और यहीं जीवन उमड़ता है, उमगता है।

    फूलों का क्या,

    कितना ही सुंदर क्यों हो

    कितनी ही सुगंधी से आपुर क्यों हो,

    एक दिन उसे तो झड़ना ही है, झुलसना ही है!

    लेकिन वंश-बीज है इनमें

    पौधों को गर्व है अपने फूलों पर।

    आकाश हो या कि इंद्रधनुष,

    यौवन की बात करें या फूलों की

    इसके अनहद स्वर, इसकी मौन भाषा

    इसके दिगंत सौंदर्य को

    पकड़ नहीं सकता कोई वैज्ञानिक मन।

    केवल हृदय ही एक यंत्र है हम सबों के पास

    उसे निरखने-परखने के लिए!

    स्रोत :
    • रचनाकार : सुशील कुमार
    • प्रकाशन : हिन्दवी के लिए लेखक द्वारा चयनित

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