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एगो बात कहियौ भाइ अग्निपुष्प!

ego baat kahiyau bhai agnipushp!

राज

राज

एगो बात कहियौ भाइ अग्निपुष्प!

राज

और अधिकराज

    कोनो अनंत यात्रा

    जखन निरर्थक

    बुझाइ छै

    ओकर

    अंतहीनताक

    निखरल

    आभास

    भ' जाइ छै

    त' लोक

    ओतै स'

    घूमि जाइ चाहैए

    'पाछू घूम

    तेज चल’

    निस्संदेह

    वर्त्तमान समय

    मोलहीनता

    सांवेदनिक संकटक

    जे कि उपभोक्तावादक

    कोखि स'

    जनमलए

    तकरे छियै

    एकर जड़ि

    अपन मुलुकक

    धरातल स'

    कटल

    जलकुम्हीये नहैंत

    हेलैत-भसियाइत

    रहलै सभ दिन

    आच्छादनक मौयैत

    भलें भोगैत रहल

    विवेकशील भू-भाग

    जेकर आदि

    तकरे अंत होइ छै

    जकरे हेमंत

    तकरे बसंत होइ छै

    केहन हतासी!

    केहन निराशा!

    एक दिन

    समटा के रहत

    बिछाओल पाशा

    हम अबस्से घूमब

    अपन बिलटल

    एहि अमोल खजाना के

    फेर पाबैक चेष्टामे

    सपरि-रपटि क'

    अपन चिर-परिचित

    रैन बसेरा दिस

    जत' निठोहर भेल

    मानवीय मोल

    नव-नौतार

    कनियाँ जकती

    असाहनि-पसाहनि केने

    हमर बाट तकैत रहत

    मनुक्ख के मशीन

    बना देबाक कुचेष्टा

    अपन बन्नूक समेट लेत

    मशीनो

    महत दुःखहाक

    बदला मथदुक्खा नै बनत

    किन्नौ नै।

    स्रोत :
    • पुस्तक : ऐ अकाबोन मे (मैथिली कविता-संग्रह) (पृष्ठ 86)
    • रचनाकार : राज
    • प्रकाशन : नवारम्भ, पटना
    • संस्करण : 2011

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