Font by Mehr Nastaliq Web

द्वासरि दुनिया

dvasari duniya

बलभद्रप्रसाद दीक्षित 'पढ़ीस'

और अधिकबलभद्रप्रसाद दीक्षित 'पढ़ीस'

    वह कउनि अजूबा नगरी हरदम

    महर-महर महकतयि रहयि।

    चँदरमा-सुरिज की किरनिन पर

    तारागन ते अठिलान करयि।

    गरमी सरदी का चूमि रही,

    घामे पर छाहीं छायि रही।

    अँध्यरिया उजेरे का लपटी,

    जगु जगमग-जगमग कीन करयि।

    कुलकानि तमासा देखि रही,

    खुलि-खिलि कयि कुमुद कमल फूले!

    छा रितु का धरे घ्वड़इयाँ पलपल,

    पर परागु बसन्तु बरसयि।

    मुनि के कुमार गभुआर

    स्वनहुले बारन की पटिया पारे।

    बाघ की पिठय्या पर नाचयिं,

    उयि पुचकारयिं,उहु दुलरावयि।

    जुआनी हयि, बुढ़ापा हयि

    घटी आवयि, बढ़ी बाढ़यि।

    परभातुइ निस-दिनु बना रहयि,

    जो जयिस रहयि, सो तयिस रहयि।

    सोने-रूपे का कलपबिरिछु

    लहरायिं जमरूद की पाती

    हीरा-मोतिन की रसरिन मा

    कस उड़न खट्वाला झूलि रहयि।

    बिरवन पर पंछी झूलि-झूलि

    सुन्दर परभाती गायि रहे

    वह सीतलि-मंद-सुगंध समीर,

    सबयि ब्यरिया मा बहा करयि।

    पियास केरि तिरखा लागयि

    भूँख का कोई नाउँ लेयि।

    हाँ, आपुइरूप अनन्दु भरा,

    प्रानी-प्रानी सबु छका रहयि!

    जयिसी द्याखउ तयिसी अपनी

    अपछरा, किन्नरी नाचि रहीं।

    अपने पन मा बिरानपनु भूला

    भँवरा-अस मड़रान करयि!

    हियाँ कोई राजा-परजा,

    लखयि कोई लरिका-पुरिखा।

    का, समानता की पटरी पर

    बच्चा-बच्चा व्यल्हरान करयि!

    स्रोत :
    • पुस्तक : पढ़ीस ग्रंथावली (पृष्ठ 73)
    • संपादक : डॉ. रामविलास शर्मा, युक्तिभद्र दीक्षित
    • रचनाकार : बलभद्रप्रसाद दीक्षित 'पढ़ीस'
    • प्रकाशन : उत्तर प्रदेश हिन्दी संस्थान, लखनऊ
    • संस्करण : 1998

    Additional information available

    Click on the INTERESTING button to view additional information associated with this sher.

    OKAY

    About this sher

    Close

    rare Unpublished content

    This ghazal contains ashaar not published in the public domain. These are marked by a red line on the left.

    OKAY