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दूसरी ओर

dusri or

जनमेजय

जनमेजय

दूसरी ओर

जनमेजय

और अधिकजनमेजय

    मैं दीवार के दूसरी ओर खड़ा हूँ

    इसके परिदृश्यों के बाहर

    और यह समय की ईकाई से

    मेरा माप ले रहा है

    —अपने किसी अनुभव की तरह।

    मेरे जन्म से पूर्व

    यह ब्रह्माँड एक बिंदु था

    और बचपन में ही

    गणित की पुस्तक में

    मैंने पढ़ लिया था कि

    एक बिंदु से अन्नत रेखाएँ गुजर सकती हैं।

    फिर भी मैं दीवार के दूसरी ओर खड़ा हूँ।

    और मैं यह भी जानता हूँ कि

    एक दिन असंख्य अनुभवों वाला यह संसार

    मेरी दरारों में

    अपना अपेक्षित जंगल बना ही लेगा

    और यह महत्वहीन होगा कि

    मैं कौन था।

    स्रोत :
    • रचनाकार : जनमेजय
    • प्रकाशन : हिन्दवी के लिए लेखक द्वारा चयनित

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