दुर्भेद्य

अमन त्रिपाठी

दुर्भेद्य

अमन त्रिपाठी

और अधिकअमन त्रिपाठी

    यह मौसम चींटियों के निकलने और मरने के लिए सबसे मुफ़ीद है

    मैं हर रोज़ लगभग दस की दर से चींटियों की हत्या कर रहा हूँ

    जबकि मेरे अगल-बग़ल से चींटियों की इतनी क़तारें फिर निकलती हैं

    मानो उन अकस्मात दुर्घटनाओं से उनकी तल्लीनता पर कोई फ़र्क़ नहीं पड़ता

    कहीं से भी फूट पड़ती चींटियों की पंक्ति एक दुर्भेद्य व्यूह रच रही है मेरी देह के चारों ओर

    घटनाओं और उनके प्रभावों की तरह जिन्हें झाड़ा भी नहीं जा सकता चींटियों की तरह

    घटनाओं और शहरों से चींटियों की तरह निकल जाना चाहता हूँ

    इस तरह चला जाऊँगा जैसे कुछ घटा ही हो

    सोचता हुआ कि जो घटा

    उसका क्या प्रभाव पड़ा मुझ पर

    फिर क्या होगा…

    घिरता चला जाऊँगा घटनाओं और उनके प्रभावों के

    असंभव व्यूह में

    द्वार खोजता!

    स्रोत :
    • रचनाकार : अमन त्रिपाठी
    • प्रकाशन : सदानीरा वेब पत्रिका

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