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दुःख से कचोटती एक कविता

dukha se kachotti ek kavita

सुशील कुमार

सुशील कुमार

दुःख से कचोटती एक कविता

सुशील कुमार

और अधिकसुशील कुमार

    विश्वास जगमगाता है रोज़ अपने घर में अब अपने ही लोगों से...

    जितनी उम्मीद कर सकता हूँ एक फूल से,

    एक पत्ती से एक चलना सीखता बच्चे से, बतर्न

    धोती, झाडू-पोछा करती कामिन से उतनी

    अपनी बेटियों-बहुओं और दिन-दिन बड़े होते लड़कों से नहीं...

    श्रीमती जी भी तो अब उन्हीं का पक्ष लेती हैं!

    घर की डौगी-बिल्लियाँ भी जितना कहना मानती,

    उतने बड़े होते बेटे-बेटियों नहीं...

    हम सादा और साफ़ अन्न खाकर, रंगहीन जल पीकर अपना दिन पालते हैं

    पिज्जा, बर्गर, चाउमिन, चिल्ली से पेट नहीं भरता अपना कोल्ड ड्रिंक्स से प्यास...

    एक ही घर में रोज़ दो जून के अलग-अलग डिश और पसंद है यहाँ, ख़ैर...

    आईने के सामने बेतरतीब पसरे उनके सौंदर्य प्रसाधनों में अपनी कोई रुचि नहीं...

    मैं सुबह की बहती हवा में घुले सुगंध का आदी रहा हूँ

    हमारे टी.वी. चैनल, हमारे टाइम-टेबल,

    हमारे बतियाने के विषय और व्यक्ति सब कुछ अलग-अलग हैं घर में..

    मेरा मानना है, सुबह होने और दिन उठने से चेहरे खिलते हैं,

    हुब आती है पसीने की बूँदों में लिपटी अपनी अप्रतिहत ज़िम्मेवारियों के श्रम से,

    क्या होगा इस नई पीढ़ी का

    जो अपने सिवाय किसी को पसंद नहीं करती

    या केवल अपने जैसे नो ही पसंद करती है

    जो सब आशाओं को बाजार से ही ख़रीदना चाहती है

    जो हमारी ज़मीन छोड़कर अपने आसमान में उड़ना चाहती है...

    मुझे दुःख है, हर जज्बा इनका एक फैशन बन गया है

    मुझे संदेह भी है कि

    जब मैं जाने लगूँगा उस दुनिया से

    तो मेरे विदा को भी वे अपने शौक के समारोह में बदल देंगे

    सच है, आँसूओ का भी अपना शृंगार होता है

    ग्लोब्लाइज होती, नित बदलती इस दुनिया में

    मैं जानता हूँ यह समय पीछे नहीं जाएगा,

    चाहे मैं कितनी कविताएँ रच लूँ

    उनके हाथों में, उनकी आँखों में वह कशिश नहीं ला पाऊँगा

    जो जीने के लिए ज़रुरी होता है

    और रोज़ मरता रहूँगा थोड़ा-थोड़ा उसके सदमे में नकारे हुए

    आदमी की ज़िंदगी जीता हुआ

    हाँ हर रोज़ असभ्य और कुलीन होते इस घर में, इस दुनिया में

    स्रोत :
    • रचनाकार : सुशील कुमार
    • प्रकाशन : हिन्दवी के लिए लेखक द्वारा चयनित

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