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दुःस्वप्न

duःsvapn

ऋषिता सिंह

ऋषिता सिंह

दुःस्वप्न

ऋषिता सिंह

और अधिकऋषिता सिंह

    एक लंबी गहरी नींद से उठकर

    एक बहुत पहले से चले रहे सपने को विराम देती हूँ

    सहसा उस सपना में ख़ुद को तुम्हारे समीप पाना मुझे डरा देता है

    कई दिनों के उस प्रयत्न को भी निष्फल करता है जहाँ मैंने सबसे कह दिया था—

    अब उसके होने ना होने का फ़र्क़ मुझे नहीं खलता

    मेरे उन सभी असत्यों का वस्त्र हरण मेरी ही आँखों के सामने होता है

    और अब मुझे विदुर कि विवशता साफ़ दिखाई देती हैं

    एक लंबी गहरी नींद से उठकर

    जब मैं दोबारा सोने का प्रयास करती हूँ

    तो फिर फिर कहती हूँ तुमसे—

    अब फिर मत आना

    जैसे कह रहीं हूँ कि—

    अब फिर आना

    तुम मेरी बातों को अनसुना कर देते हो

    और तभी आते हो जब मुझे विश्वास हो चुका होता है कि

    अब तुम कभी नहीं आओगे!

    स्रोत :
    • रचनाकार : ऋषिता सिंह
    • प्रकाशन : हिन्दवी के लिए लेखक द्वारा चयनित

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