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दुःख की भूख

duःkha ki bhookh

तैबा हबीब

तैबा हबीब

दुःख की भूख

तैबा हबीब

और अधिकतैबा हबीब

    भूख लगने पर

    कोई कोई

    कुछ कुछ

    खा ही लेता है

    सुख में इंसान समाँ जाता है

    दुःख इंसान को निगल जाता है

    दाने-दाने पर खाने वाले का नाम लिखा होता है

    दुःख पर भी लिखा होता होगा नाम

    पेट भर जाने पर खाना छूट जाता है

    दुःख के साथ ऐसा नहीं होता

    वो तुम्हें खाता है और धीरे-धीरे निगल जाता है

    सुख का होना अमृत की एक बूंद जैसा

    जो प्रतीक्षा उस मार्ग पर खड़ी सबसे बड़ी त्रासदी है

    सुख के आगमन

    दुःख के अंत

    और सपनों के साकार होने की प्रतीक्षा

    सभी अनंत

    हर त्रासदी, दूसरी त्रासदी से अलग होती है

    जैसे हर दुःख तीसरे दुःख से जुदा

    प्राथमिकताओं का सार हो जैसे जीवन

    दुःख भी प्राथमिकताओं में बंधा हो जैसे

    किस दुःख का शोक कितना और कितनी देर गूँजेगा

    कौन जानता है

    मृत्यु के बाद भी, चिपका रहता है दुःख

    कौन जानता है

    तुम्हारे दुःख की पीड़ा किसी को पता भी होगी

    कौन जानता है

    किसी को नहीं लगती

    दुःख की भूख

    अगर लगती

    तो नहीं होती मौत

    किसी की भी भुखमरी से

    क्योंकि हर किसी के हिस्से में होता है इतना दुःख

    अन्न ना मिलने पर, किसी की भी नहीं होती मृत्यु।

    स्रोत :
    • रचनाकार : तैबा हबीब
    • प्रकाशन : हिन्दवी के लिए लेखक द्वारा चयनित

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