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दोहराव

doharav

मधु चतुर्वेदी

और अधिकमधु चतुर्वेदी

    मौसम बार-बार ख़ुद को दोहराते हैं

    मगर इस बरस की बारिश

    पिछले साल की बारिश नहीं है

    गुज़रती ठंड कभी लौटकर नहीं आएगी

    वह विदा लेती है हमेशा के लिए

    अलग-अलग ज़िंदगियों के हादसे, पीड़ा, प्रेम—

    दरअस्ल, दुनिया का एक दोहराव भर हैं

    दर्द बार-बार लौटते हैं

    मगर इंसान हर बार बदल जाते हैं

    ठंड धीरे-धीरे कम होती जाती है

    वसंत को जगह देने के लिए

    और फिर हौले से गुज़र जाता है

    जाड़ों का मौसम

    ठंड, बारिश, गर्मी—

    रातों-रात नहीं आती-जातीं

    वे धीरे-धीरे घटती हैं

    और एक दिन

    लुप्त हो जाती हैं

    प्रेम भी

    दुख भी

    अचानक ख़त्म नहीं होते

    हर भाव

    धीरे-धीरे

    फीका पड़ता है

    आसमान और धरती के लिए

    कोई भी मौसम

    कोई भी क़िस्सा

    नया नहीं है

    कोई दुख

    आज पहली बार

    नहीं जन्मा है

    किसी लगाव की खोज

    आज शुरू नहीं हुई है

    किसी पीड़ा का

    अन्वेषण भी अभी नहीं हुआ

    कई लोग पहले पहन-ओढ़ चुके हैं

    इस वेदना को

    यह संताप

    कई बदनों से होकर आई

    एक उतरन है

    हर आदमी

    उसे पहली बार पहनता है

    हम

    सिर्फ़ राहगीर हैं—

    एक बार गुज़र जाने वाले

    मौसम और दर्द को बार-बार

    इस धरती पर लौटना है।

    स्रोत :
    • रचनाकार : मधु चतुर्वेदी
    • प्रकाशन : हिन्दवी के लिए लेखक द्वारा चयनित

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