आँख मूँदे बिल्ली जैसे,
सरपट दूध–कटोरा चट कर जाती।
दो-मुँहे साँप-सा लहलहाता,
ख़ुद को ही निगल जाता
ऐसा ही है दोगलापन इंसान का।
दो नाव पर पैर रखकर
करना चाहे पार भवसागर।
आदर्शों का जाल बुनकर,
सपनों जैसा जीवन रंजन,
समय के पहिए को अनदेखा कर,
शुतुरमुर्ग-सा डर में रहकर,
इंसान-इंसान में भेद दिखाकर,
रंगों को भी ऊँच-नीच बताकर,
स्वार्थ को अपनी आत्मा से ऊपर रखकर,
झूठ की दुनिया को “जीवन” नाम देकर,
बेटा-बेटी को रूढ़िवादी समाज की नोक पर नचाकर,
स्त्री-पुरुष को भिन्न बताकर,
हरियाली को धरती की गोद से ग़ायब कर,
जीव-जंतुओं-असहाय मनुष्यों से सौतेला व्यवहार कर,
देवी को पूजें, स्त्री को दुत्कारे,
ग़रीब को मार, दान का ढोंग रचाते,
उद्दंडता को अपनी रग-रग में बसाकर,
दो हाथ जोड़, अहंकार में भगवान से हीरे-मोती माँगे
अरे ओ! भिखारी!
दुनिया झेल रही है दोगलेपन की बीमारी।
कहते हैं सब-यही है दुनियादारी।
अज्ञानता की ये नौका तो डूबेगी ही, ब्वारी,
तुम कहोगी “सब ठीक है” समाज में
वो लूट लेंगे तेरी अलमारी।
(ब्वारी = बहू, गढ़वाली)
- रचनाकार : कंचन बुटोला
- प्रकाशन : हिन्दवी के लिए लेखक द्वारा चयनित
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