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कविताक वितानमे

kavitak vitanme

दीप नारायण

दीप नारायण

कविताक वितानमे

दीप नारायण

और अधिकदीप नारायण

    हम नहि! अहूँ नहि!

    एहि बातक पाछा

    व्याकुल अछि

    समुच्चा मानव जाति,

    कौआ-चील

    गाछ-वृक्ष, चुट्टी-पिपरी...

    एहि फूल परहक फतिंगा सेहो।

    विकराल अछि समय

    से ठीके!

    हमरे-अहाँक लेल नहि

    समुच्चा पिरथीक लेल...।

    पिरथीक अंतिम हिचकीसँ पहिने

    नहि देखबामे आबि रहल अछि,

    एखन ओ, कल्याणकारी नीलकंठ

    जे उड़ि-उड़ि क'

    अबैत छल बैसए लेल

    हमरा घरक सोझाँमे

    बिजलीक तार बला पोल पर

    नहि पहुँचि रहल अछि कान धरि—

    नमाजक आमंत्रणमे मुअज्जिनक अजानक टाहि,

    महादेव मंदिरक घण्टा आरतीक स्वर सेहो।

    कू...कू...जतेक बेर कहैत छलियै हम

    ततेक बेर हमर कू...कूक प्रत्युत्तरमे

    आम गाछक फुनगी परसँ नित्तह

    कोइली अपन अवाज मिठाबए लेल

    करैत रहैत छली हमरा संगे रेआज

    कतए चलि गेली ओ?

    केओ नहि देखलखिन!

    गाम-घर, शहर

    देस-बिदेस

    सिकुड़ि गेल अछि सभ

    ‘आइशोलेट' भ' चुकल छी हम

    अपन घरमे, घरक एकटा कोनमे

    दोसर कोनमे अहाँ

    नहि जानि कतेक प्रकाश बर्खक दूरी पर।

    धर्म-अधर्म

    युद्ध-महायुद्ध

    अनु-परमाणु

    क्रूज-मिसाइल

    वर्ण-जाति

    खण्ड-पाखण्ड

    ढोंग-चमत्कार

    भक्ति-अंधभक्ति

    वेद, पुराण, उपनिषद

    गीता, रामायण, कुरान...

    एत' धरि कि जासूसी उपन्यास पर्यन्त

    निसबद अछि

    फुटि नहि रहल छनि बकार

    नहि सूझि रहल छनि कोनो उपाय

    नहि लागि रहल छनि कोनो उक्ति।

    चौपेतले रही गेलैक उतरबरिया हन्नाक

    पुबरिया कोन महक कोठीक कान्ह पर रक्षातंत्र।

    जेना पोखरिक पानिमे

    ढेप मारलाक बाद...

    डोलए लगैत छैक देहक छाह

    तहिना डोलि रहल अछि एखन पिरथी

    भोरे-भोर हॉकर फेक जाइत अछि अखबार जेना

    बिग देलकैक अछि केओ जुमा क’

    सुरुजकेँ कारी समुद्रक बीच।

    मंगल वा कि चंद्रयात्रा नहि थिक

    जकरा नापि लेबै रॉकेटसँ झट द'

    चीन, अमेरिका, इटली

    रूस, फ्रांस भारत...थिकि

    पिरथी थीकि मीत

    एतए दुनू पएर मात्र साधन छैक

    जकरा एखन गछेर लेने अछि निठुर समय।

    समय एखन बटि गेल अछि

    कए गोट खेमामे

    सभ खेमा आपसिमे

    क' रहल अछि वार्तालाप

    तार्किक वार्तालाप!

    ओहि वार्तालापसँ भ' रहल अछि

    नव-नव विचारक प्रस्फुटन

    जकरा सभ मौलिक कहि

    बिदेसी लेबुल लागल लिफाफसँ बाहर क'

    पैक क' रहल अछि पॉलोथिन बाला पन्नीमे।

    बात जे किछु हो मुदा,

    सत्य बहुत कठिन वाक्य अछि—

    समय धकिया रहल अछि हमरा सभकेँ

    धकियबैत-धकियबैत

    द' आओत पाछू, बहुत पाछू

    हमरा लोकनि चलि जाएब

    आगुसँ पछिला शताब्दी दिस...

    साँपक केँचुआ जकाँ।

    हमरा डर अछि

    ताहिसँ बेसी हिम्मति अछि

    जे अन्तिम वाक्य जे कहि रहल छथि

    से कोनो कवियेटा कहि सकैत छथि—

    हम बचा लेबैक पिरथीकेँ अपन कविताक वितानमे

    कविताकेँ डर नहि होइत छैक

    बहुत निडर अछि!

    ईश्वरसँ पैघ अछि कविता।

    स्रोत :
    • पुस्तक : आब कतेक चुप रहू (मैथिली कविता-संग्रह) (पृष्ठ 76)
    • रचनाकार : दीप नारायण
    • प्रकाशन : राजकमल प्रकाशन, नई दिल्ली
    • संस्करण : 2021

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