दिसंबर को एक क्रांति की ज़रूरत है...
disambar ko ek kranti ki zarurat hai. . .
अजय कुमार यादव
Ajay Kumar Yadav
दिसंबर को एक क्रांति की ज़रूरत है...
disambar ko ek kranti ki zarurat hai. . .
Ajay Kumar Yadav
अजय कुमार यादव
और अधिकअजय कुमार यादव
दिसंबर उतर आया है...
किसी पुराने सामंत की तरह
सफ़ेद चादर ओढ़े,
राजधानी के संगमरमरी गलियारों में टहलता हुआ।
लाल किले की दीवारें ठिठुर रही हैं,
जहाँ अलाव नहीं, इतिहास जल रहा है
दीवालों के किनारे पर
दान में मिले कंबल के नीचे ठिठुरते उस शख़्स के पीछे
‘देश की प्रगति’ के पोस्टर लगे हैं
राजधानी अपनी बेबसी पर काँप रही है।
उस शख़्स के ऊपर
दुख नाच नहीं रहा है
दुःख काँप रहा है
एक और कंबल की उम्मीद में...
मैं त्रिवेणी कैफ़े में बैठा
उसे याद कर रहा हूँ
मेरा सूप गर्म है,
संवेदनाएँ ठँडी..
मैं सोच रहा हूँ इतिहास में
दिसंबर में अनगिनत युद्ध हुए
क्रांतियाँ हुई...
जब ठँड बहुत बढ़ती है,
तो आग माँगने वाले लोग
क्रांति कर देते हैं।
एक बार फिर
दिसंबर को एक क्रांति की ज़रूरत है...
- रचनाकार : अजय कुमार यादव
- प्रकाशन : हिन्दवी के लिए लेखक द्वारा चयनित
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