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धूप और छाँव

dhoop aur chhaanv

शिवम् अवस्थी

शिवम् अवस्थी

धूप और छाँव

शिवम् अवस्थी

और अधिकशिवम् अवस्थी

    चल पड़े जो इस सफ़र में, पाँव के छाले गिनना,

    मंज़िलों की इस डगर पर, फासलों के जाल बुनना।

    ज़िंदगी तो एक पहेली, हर क़दम पर उलझी-उलझी,

    डूबती कश्ती के हिस्से, रही है नाव कितनी!

    कौन गिन पाया है आख़िर, धूप में भी छाँव कितनी?

    उम्र बीती है कहाँ तक, और बाकी राह कितनी?

    हम चले थे आसमाँ के, चाँद तारों को चुराने,

    वक्त की इन साज़िशों के, अनकहे से तीर खाने।

    मंज़िलों ने भी हमारे, साथ कैसा छल किया है,

    इस अधूरे कारवाँ में, रह गई फ़रियाद कितनी!

    कौन गिन पाया है आख़िर, धूप में भी छाँव कितनी?

    उम्र बीती है कहाँ तक, और बाकी राह कितनी?

    हमसफ़र जो साथ थे कल, आज वो अनजान से हैं,

    भीड़ के इस शहर में हम, किस क़दर हैरान से हैं।

    छूटते हाथों ने हमको, अश्क के उपहार बख्शे,

    इन हथेली की लकीरों, में बची है याद कितनी!

    कौन गिन पाया है आख़िर, धूप में भी छाँव कितनी?

    उम्र बीती है कहाँ तक, और बाकी राह कितनी?

    रोशनी की खोज में हम, मोम से जलते रहे हैं,

    शूल की इन वादियों में, मुस्कुरा चलते रहे हैं।

    आँधियों के इस शहर में, हौसला बाक़ी बहुत है,

    देखना है इन परों में, रह गई परवाज़ कितनी!

    कौन गिन पाया है आख़िर, धूप में भी छाँव कितनी?

    उम्र बीती है कहाँ तक, और बाकी राह कितनी?

    स्रोत :
    • रचनाकार : शिवम् अवस्थी
    • प्रकाशन : हिन्दवी के लिए लेखक द्वारा चयनित

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