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धरती की देह पर श्रम की शोकगाथा

dharti ki deh par shram ki shokgatha

रिदम राही

रिदम राही

धरती की देह पर श्रम की शोकगाथा

रिदम राही

और अधिकरिदम राही

    कुछ लोगों को विरासत में मिलता है संघर्ष

    अँधेरे जीवन के खरपतवार निकालते,

    अपना अस्तित्व तलाशते, कुदाल चलाते

    यातनाओं के पत्थरों पर चलती है हथौड़े की मार

    ताकि कहीं से रास्ता बन सके।

    यूँ ही जिनका जीवन जंगल है

    बस वही ओढ़ना-बिछाना

    पत्तों की सोहबत

    काँटो का ऐतबार

    फूलों का शृंगार

    दुनिया की दूरी उस नीले आकाश तक

    जिसे वह देख सके, पर छू सके।

    धरती की देह पर गिरता है श्रमजल

    जो संघनित होकर लौटता है बरसात में

    मौसमी चक्र में बुवाई-कटाई-सा

    उसकी भी माँग घट-बढ़ जाती है।

    महीनों आकाश निहारते शून्य भी निकल जाते

    इस उम्मीद में कि घने स्याह जंगलों में

    कहीं रोशनी के दिन बहुरेंगे।

    बहुतेरे संघर्ष ऐसे भी, जो सालों

    घर की रोटी का स्वाद नहीं पाते

    और पूछते हैं, वे धरती पर आए क्यों?

    बाट जोहते हैं, साँसें टूटते हुए भी,

    दरख़्तों के पत्तों की बटोरन में,

    जैसे ख़ुद को समेट रहे हों।

    जिनका जीवन प्रश्न ही प्रश्न है,

    और उत्तर पाने के लिए

    रोज डसता है ये बाज़ार

    जोंक की तरह,

    और चूस लेता है ख़ून

    साहूकार की शक्ल में।

    कहीं मजदूरी मारी जाती है,

    कहीं सस्ते श्रम की बली दी जाती है।

    पत्थरों को तोड़कर

    वे रास्ता तो बना देते हैं,

    कई बाबुओं के बंगले,

    संसद की दीवारें और छत भी।

    मगर उनके अधिकारों के गुंबद

    आज भी जर्जर हैं।

    इस लोकतंत्र में

    उनकी साँसें कहीं दबी हुई हैं,

    और आवाज़ करना सख़्त मना है।

    स्रोत :
    • रचनाकार : रिदम राही
    • प्रकाशन : हिन्दवी के लिए लेखक द्वारा चयनित

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